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Monday, 9 March 2015

इब्तिदाए इश्क में रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है क्या?

अनुज शुक्ला।
तो भाजपा का डूबना तय है। शुरुआत दिल्ली ने की है। पुख्ता करने की कोशिश जम्मू-कश्मीर में हुई। अब बारी पश्चिम बंगाल और बिहार की है। एक कहावत है कि दूध से जली बिल्ली मठा भी फूंक-फूंक कर पीती है। लेकिन भाई ये कहावत बीजेपी पर लागू नहीं होती। इसकी एक वजह तो यह है कि साहब आप इन्हें बिल्ली न कहें! शेर हैं भाई ये, और दूसरी बात मोदी-अमितमय भाजपा के विज़न पर उंगली मत उठाइए। सपने बुनना। जनाब हिंदुस्तानियों के लिए सपने से बेहतर क्या? मन की बात कीजिए आप तो। सुनने में आ रहा है कि भाजपा वाले दीदी के बेंगाल में भगवा जादू चलाने के चक्कर में लग गए हैं। किरण बेदी का सबक तो बीते जमाने की बात हुई साब। अब तो जमाना ऐसा है कि ट्विटर पर जो चहचाइएगा, बच्चा-बच्चा वही जबान बोलेगा- बिल्कुल मन के बात सरीखी। बहरहाल, ये राम रोना फिर कभी। सुनने में ये आ रहा है कि बंगाल में भाजपा एक साफ छवि और ठीक-ठीक किरण बेदी की तरह ही कोई मल्टी टैलेंटेड चेहरा ढूढ़ रही है। कहा तो यह भी जा रहा है कि उसकी यह खोज पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली के रूप में समाप्त भी हो गई है। साब, आपको बता दें कि सत्याग्रह नाम की एक हिन्दी वेबसाइट ने अपनी इनसाइड स्टोरी में इसी लब्बोलुबाब की एक रपट प्रकाशित की है। जिसका कहना है कि अमित शाह (निश्चित ही मोदी भी) चाहते हैं कि बंगाल का चुनाव बाबू मोशाय के नेतृत्व में लड़ा जाए। उन्हें सीएम का कैंडीडेट बनाने की योजना है जनाब। रपट में यहाँ तक कहा गया है कि भाजपा यह प्रयोग कई और राज्यों में करना चाहती है। ऐसे राज्यों में जहाँ, भाजपा के पास कोई मशहूर नेता नहीं है वहाँ किसी लोकप्रिय चेहरे के नेतृत्व में भाजपा चुनाव लड़ना चाहती है। रपट के मुताबिक वर्ल्ड कप के बाद गांगुली के हाथों बंगाल भाजपा की औपचारिक कमान सौंप दी जाएगी। यानी कि पार्टी विद डिफरेंस अब सत्ता हथियाने के लिए अपने ही काडर और सिद्धांतों को किनारे रखकर पॉप्युलर किस्म की राजनीति का सहारा ले रही है। वैसे भी, जम्मू-कश्मीर की मोहब्बत के बाद अब सिद्धांत का क्या रोना। गांगुली जी को चुनाव तक अग्रिम बधाई। आप तो साहब इस शेर का मजा लीजिए- इब्तिदाए इश्क में रोता है क्या, आगे आगे देखिए होता है क्या?

2 comments:

  1. सही समय पर सही पोस्ट ,अमितवा ऐसा डुबोयेगा कि फिर बाहर नहीं निकल पाएंगे

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