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Friday, 20 March 2015

नकल बिहार में ही नहीं तमिलनाडु में भी है, होता है FIR तब खुलती है पोल

खबरची। ऐसा नहीं है कि नकल, पिछड़ा कहे जाने वाले बिहार में ही होती है। यह एक ऐसी बीमारी है जिससे शायद ही देश का कोई हिस्सा बचा हो। बिहार में चीटिंग को लेकर बहस थमीं नहीं थी कि तमिलनाडु में भी नकल का एक हाइटेक मामला सामने आया है। बताते चलें कि पढ़ाई-लिखाई के मामले में काफी अव्वल माने जाने वाले इस राज्य में चार अध्यापकों को व्हाट्सऐप की मदद से पर्चा लीक व नकल कराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।
इस मामले के तहत कृष्णगिरी जिले के हौसर में एक हायर सेकंडरी स्कूल में व्हाट्सऐप की मदद से 12वीं का पर्चा लीक करने के आरोप में चार टीचर्स को गिरफ्तार भी कर लिया गया हैं। चारों अध्यापकों की पहचान पी.महेन्द्रन (35), आर.उदयकुमार (33), एस.गोविंदन (38) और वी.कार्तिकेयन (34) के रूप में हुई है।

गौरतलब है कि इसी बुधवार को महेंद्र, स्कूल में एग्ज़ाम ड्यूटी कर रहा था। आरोप है कि ड्यूटी के दौरान उसने मैथ के पर्चे की फोटो खींचकर व्हाट्सऐप ग्रुप में शामिल अन्य तीन टीचर्स के पास भेज दिया। एक स्थानीय अख़बार से बातचीत में कृष्णगिरी के जिला शिक्षा अधिकारी रामस्वामी ने बताया है कि परीक्षा के दौरान किसी भी टीचर को हॉल के भीतर सेलफोन के यूज़ की सख्त मनाही है। बावजूद आरोपी टीचर इसका इस्तेमाल कर रहा था।

रामस्वामी ने बताया है कि इस मामले में डिपार्टमेंट की ओर से मामला दर्ज करवाया गया। इसके बाद पुलिस ने जांच की और मामले में संदिग्ध पाए गए टीचर्स के खिलाफ एक्शन लिया।

Tuesday, 17 March 2015

देखो कि तुम्हारे पाँव तले भी धरती है - दुष्यंत

फोटो : विजय बहादुर सिंह द्वारा संपादित किताब का कवर
खबरची। दुष्यंत ऐसे कवि हैं जिनकी दर्जनों कविताएं पूरी की पूरी याद थी। अभी भी कायदे से तमाम कविताएँ, गजलों की लाइनें याद है। पहली बार यह किताब (साए में धूप) बाल भारती से खरीदकर जितेंद्र ने दी थी। मुट्ठीगंज में कटघर के उस लिजलिजे मकान में सैकड़ों बार मैंने 'साए में धूप' की एक-एक कविता पढ़ी होगी। उस वक्त समझ क्या थी, ज्यादा तय होकर कुछ नहीं कह सकता। ईसीसी के जमाने में मंच से अपनी बात रखने के लिए जिन कवियों का सहारा लेता था, उनमें दुष्यंत अनिवार्य थे। फिर धूमिल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, निराला और कुछ अन्य (गिनती के)। इतनी आग, इतना आक्रोश इतना प्रवाह - किसी दूसरे किसी हिन्दी गीतकार कवि में नहीं ढूँढ पाया। हालांकि उस वक्त तक मुठभेड़ कई तीसमारखाँओं से होने लगी थी, लेकिन ऊपर असर छोड़ने वाले दो चार ही मिले। अब सोचता हूँ तो लगता है कि तब दुष्यंत को पढ़ना, जैसे उनको सीधे सुनना जैसा था। वक्त इतना तेज क्यों है अरिमर्दन भाई। क्या ये लौट नहीं सकता, ठहर नहीं सकता।
एक पसंदीदा कविता, 'कवितकोष' से कॉपी पेस्ट कर रहा हूँ, आप भी पढ़िए -

सब बियाबान, सुनसान अँधेरी राहों में
खंदकों खाइयों में
रेगिस्तानों में, चीख कराहों में
उजड़ी गलियों में
थकी हुई सड़कों में, टूटी बाहों में
हर गिर जाने की जगह
बिखर जाने की आशंकाओं में
लोहे की सख्त शिलाओं से
दृढ़ औ’ गतिमय
हम तीन दोस्त
रोशनी जगाते हुए अँधेरी राहों पर
संगीत बिछाते हुए उदास कराहों पर
प्रेरणा-स्नेह उन निर्बल टूटी बाहों पर
विजयी होने को सारी आशंकाओं पर
पगडंडी गढ़ते
आगे बढ़ते जाते हैं
हम तीन दोस्त पाँवों में गति-सत्वर बाँधे
आँखों में मंजिल का विश्वास अमर बाँधे।
X X X X
हम तीन दोस्त
आत्मा के जैसे तीन रूप,
अविभाज्य--भिन्न।
ठंडी, सम, अथवा गर्म धूप--
ये त्रय प्रतीक
जीवन जीवन का स्तर भेदकर
एकरूपता को सटीक कर देते हैं।
हम झुकते हैं
रुकते हैं चुकते हैं लेकिन
हर हालत में उत्तर पर उत्तर देते हैं।
X X X X
हम बंद पड़े तालों से डरते नहीं कभी
असफलताओं पर गुस्सा करते नहीं कभी
लेकिन विपदाओं में घिर जाने वालों को
आधे पथ से वापस फिर जाने वालों को
हम अपना यौवन अपनी बाँहें देते हैं
हम अपनी साँसें और निगाहें देते हैं
देखें--जो तम के अंधड़ में गिर जाते हैं
वे सबसे पहले दिन के दर्शन पाते हैं।
देखें--जिनकी किस्मत पर किस्मत रोती है
मंज़िल भी आख़िरकार उन्हीं की होती है।
X X X X
जिस जगह भूलकर गीत न आया करते हैं
उस जगह बैठ हम तीनों गाया करते हैं
देने के लिए सहारा गिरने वालों को
सूने पथ पर आवारा फिरने वालों को
हम अपने शब्दों में समझाया करते हैं
स्वर-संकेतों से उन्हें बताया करते हैं--
‘तुम आज अगर रोते हो तो कल गा लोगे
तुम बोझ उठाते हो, तूफ़ान उठा लोगे
पहचानो धरती करवट बदला करती है
देखो कि तुम्हारे पाँव तले भी धरती है।’
X X X X
हम तीन दोस्त इस धरती के संरक्षण में
हम तीन दोस्त जीवित मिट्टी के कण कण में
हर उस पथ पर मौजूद जहाँ पग चलते हैं
तम भाग रहा दे पीठ दीप-नव जलते हैं
आँसू केवल हमदर्दी में ही ढलते हैं
सपने अनगिन निर्माण लिए ही पलते हैं।

हम हर उस जगह जहाँ पर मानव रोता है
अत्याचारों का नंगा नर्तन होता है
आस्तीनों को ऊपर कर निज मुट्ठी ताने
बेधड़क चले जाते हैं लड़ने मर जाने
हम जो दरार पड़ चुकी साँस से सीते हैं
हम मानवता के लिए जिंदगी जीते हैं।
X X X X
ये बाग़ बुज़ुर्गों ने आँसू औ’ श्रम देकर
पाले से रक्षा कर पाला है ग़म देकर
हर साल कोई इसकी भी फ़सलें ले खरीद
कोई लकड़ी, कोई पत्तों का हो मुरीद
किस तरह गवारा हो सकता है यह हमको
ये फ़सल नहीं बिक सकती है निश्चय समझो।
...हम देख रहे हैं चिड़ियों की लोलुप पाँखें
इस ओर लगीं बच्चों की वे अनगिन आँखें
जिनको रस अब तक मिला नहीं है एक बार
जिनका बस अब तक चला नहीं है एक बार
हम उनको कभी निराश नहीं होने देंगे
जो होता आया अब न कभी होने देंगे।
X X X X
ओ नई चेतना की प्रतिमाओं, धीर धरो
दिन दूर नहीं है वह कि लक्ष्य तक पहुँचेंगे
स्वर भू से लेकर आसमान तक गूँजेगा
सूखी गलियों में रस के सोते फूटेंगे।

हम अपने लाल रक्त को पिघला रहे और
यह लाली धीरे धीरे बढ़ती जाएगी
मानव की मूर्ति अभी निर्मित जो कालिख से
इस लाली की परतों में मढ़ती जाएगी
यह मौन
शीघ्र ही टूटेगा
जो उबल उबल सा पड़ता है मन के भीतर
वह फूटेगा,
आता ही निशि के बाद
सुबह का गायक है,
तुम अपनी सब सुंदर अनुभूति सँजो रक्खो
वह बीज उगेगा ही
जो उगने लायक़ है।
X X X X
हम तीन बीज
उगने के लिए पड़े हैं हर चौराहे पर
जाने कब वर्षा हो कब अंकुर फूट पड़े,
हम तीन दोस्त घुटते हैं केवल इसीलिए
इस ऊब घुटन से जाने कब सुर फूट पड़े । - दुष्यंत

Sunday, 15 March 2015

तो क्या संजय दत्त, मधुर भंडारकर, दलेर मेहंदी 'गोमांस' खाते थे?


खबरची। क्या बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त, डायरेक्टर मधुर भंडारकर और मशहूर गायक दलेर मेहंदी गोमांस खाते थे? अब इस बात में कितनी सच्चाई है, इसका दावा तो नहीं किया जा सकता लेकिन Times od India में प्रकाशित एक खबर की मानें तो बॉलीवुड से जुड़ी ये तीनों मशहूर हस्तियां, मुंबई में एक ऐसे रेस्टोरेंट में भोजन कर चुके हैं, जो मुंबई में गोमांस व्यंजनों के लिए फेमस माना जाता है।

इस रेस्टोरेंट का नाम नूर मोहम्मदी होटल है, जो मोहम्मद अली रोड पर 1920 में खोला गया था। होटल के मालिक ख़ालिद हकीम बताते हैं कि बीफ पर बैन का असर उनके कारोबार पर पड़ा है। रिपोर्ट में अली ने कहा है कि मशहूर चित्रकार एमएफ हुसैन अक्सर उनके होटल आया करते थे। यहां भोजन कर चुकी अन्य मशहूर हस्तियों में बॉलीवुड एक्टर संजय दत्त, मधुर भंडारकर, दलेर मेहंदी, लकी अली जैसे लोग शामिल हैं। हकीम ने बताया कि यहां संजय दत्त के नाम पर एक खास डिश भी सर्व की जाती है। हकीम के मुताबिक उनके कस्टमर्स में कई दूसरी सेलीब्रिटीज़ भी शामिल हैं।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में गोमांस पर प्रतिबंध लगा देने के बाद से ही पूरे देश में इसको लेकर बहस जारी है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो राज्य सरकार के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं। जबकि संघ से जुड़े लोग इसे जायज ठहराते हुए फैसले का स्वागत कर रहे हैं।

3 माह से मनरेगा में काम कर रहे हैं 12 मजदूर लेकिन किसी को नहीं मिला भुगतान, एक कॉल से कर सकते हैं मदद

सांकेतिक फोटो
खबरची। झारखंड के एक पिछड़े इलाक़े में मनरेगा के तहत 12 मजदूर पिछले तीन माह से काम कर रहे हैं। लेकिन उन्हें उनकी मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा रहा है। सभी मजदूर लोहारदगा जिले के कुड़ु ब्लॉक में काकरगढ़ गांव के हैं। मजदूरी नहीं मिलने के कारण ये और इनका परिवार काफी परेशान हैं।

बताते चलें कि इन मजदूरों ने पेमेंट के लिए अफसरों की चौखट पर गुहार भी लगाई बावजूद किसी अधिकारी ने उनकी परेशानी को गंभीरता से नहीं लिया। पेमेंट नहीं होने के कारण दिहाड़ी मजदूरों के सामने आजीविका का संकट है। सिटीजन जर्नलिज़्म के लिए काम करने वाली सीजीनेट स्वरा की टीम एक यात्रा के तहत जब इस गांव पहुँची तो वहाँ के हालात से वाकिफ हुई। मजदूरों की रिकॉर्ड आपबीती सीजीनेट की वेबसाइट पर पब्लिश किया गया है।

अगर आप यह रिपोर्ट पढ़ रहे हैं तो आप की एक कोशिश से मजदूरों की समस्या का समाधान हो सकता है। बस आप अपने मोबाइल नंबर से संबंधित अधिकारियों को फोन कर भुगतान न करने की वजह पूछे। संबंधित बीडीओ से बात करने के लिए 09835547760 जबकि कलेक्टर से को 09470590889 पर कॉल करें।

Saturday, 14 March 2015

इश्क का हौसला है शर्त वरना, बात का किस को ढब नहीं आता...

खबरची। मीर तकी मीर का जन्म 1723 में आगरा में हुआ था। आप उर्दू और फारसी भाषा के बड़े शायर थे। आपका मूल नाम मोहम्मद तकी था। सीधी-सपाट जबान में शेर कहने वाले मीर एक ऐसे शायर थे, जिनका नाम आज भी बड़े अदब से लिया जाता है। मीर साहब की पांच गज़लें आपकी नज्र हैं, मुलाहिजा फरमाइए -

1.
अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब।
मुझ दिल-जले को नींद न आई तमाम शब।

चमक चली गई थी सितारों की सुब्‍ह तक,
की आस्माँ से दीदा-बराई तमाम शब।

जब मैंने शुरू क़िस्सा किया आँखें खोल दीं,
यक़ीनी थी मुझको चश्म-नुमाई तमाम शब।

वक़्त-ए-सियह ने देर में कल यावरी सी की,
थी दुश्मनों से इनकी लड़ाई तमाम शब।


2
जीते-जी कूचा-ए-दिलदार से जाया न गया
उसकी दीवार का सर से मेरे साया न गया

गुल में उसकी सी जो बू आई तो आया न गया
हमको बिन दोश-ए-सबा बाग से लाया न गया

दिल में रह दिल में कि मे मीर-ए-कज़ा से अब तक
ऐसा मतबूअ मकां कोई बनाया न गया

क्या तुनुक हौसला थे दीदा-ओ-दिल अपने, आह
एक दम राज़ मोहब्बत का छुपाया न गया

शहर-ए-दिल आह अजब जगह थी पर उसके गए
ऐसा उजड़ा कि किसी तरह बसाया ना गया


3.
अपने तड़पने की मैं तदबीर पहले कर लूँ
तब फ़िक्र मैं करूँगा ज़ख़्मों को भी रफू का।

यह ऐश के नहीं हैं या रंग और कुछ है
हर गुल है इस चमन में साग़र भरा लहू का।

बुलबुल ग़ज़ल सराई आगे हमारे मत कर
सब हमसे सीखते हैं, अंदाज़ गुफ़्तगू का।


4
अश्क आंखों में कब नहीं आता
लहू आता है जब नहीं आता।

होश जाता नहीं रहा लेकिन
जब वो आता है तब नहीं आता।

दिल से रुखसत हुई कोई ख्वाहिश
गिरिया कुछ बे-सबब नहीं आता।

इश्क का हौसला है शर्त वरना
बात का किस को ढब नहीं आता।

जी में क्या-क्या है अपने ऐ हमदम
हर सुखन ता बा-लब नहीं आता।


5
अब जो इक हसरत-ए-जवानी है
उम्र-ए-रफ़्ता की ये निशानी है।

ख़ाक थी मौजज़न जहाँ में, और
हम को धोखा ये था के पानी है।

गिरिया हर वक़्त का नहीं बेहेच
दिल में कोई ग़म-ए-निहानी है।

हम क़फ़स ज़ाद क़ैदी हैं वरना
ता चमन परफ़शानी है।

याँ हुए 'मीर' हम बराबर-ए-ख़ाक
वाँ वही नाज़-ओ-सर्गिरानी है।

गजब है मोदी सरकार, मामूली मीटिंग पर 43 लाख रु. खर्चा, 75 हजार की सजावट

फ़ाइल फोटो

खबरची। पिछले कई दशक से ही हिंदुस्तान की सरकारें गंगा की सफाई के बहाने हजारों करोड़ रुपए पानी में बहा चुकी है और आने वाले सालों में भी ये सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। बड़े-बड़े वादों से गंगा और जनता को नमामि गंगे के जरिए स्वच्छता की नई उम्मीद देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्री भी गंगा की सफाई के नाम पर एक बैठक में लाखों रुपए का बंटाढार कर रहे हैं। इसी वजह से लोकसभा चुनाव में बनारस (काशी) से जीतकर प्रधानमंत्री बने मोदी का गंगा की सफाई का सपना खर्चीला साबित होने जा रहा है। इसका अंदाजा इस बात से ही लगा सकते हैं कि गंगा सफाई के नाम पर हुई एक मामूली बैठक पर लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं।

आरटीआई कार्यकर्ता गोपाल प्रसाद की ओर से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के आधार पर सरकार ने विज्ञान भवन में स्वच्छ गंगा के लिए आयोजित राष्ट्रीय मिशन की एक बैठक पर 43.85 लाख रुपए खर्च किए। बैठक के लिए खर्च किए पैसों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं, क्योंकि बैठक के लिए आए अतिथियों की सुविधाओं पर 26.7 लाख रुपए खर्च किए गए। जबकि अधिकारियों की यात्रा पर 8.8 लाख रुपए बहा दिए गए। इसके साथ ही गंगा की सफाई के लिए प्रचार पर 5.1 लाख रुपए खर्च किए गए।

दिलचस्प है कि सरकार ने इस बैठक के लिए 75 हजार रुपए सिर्फ साज सज्जा पर खर्च किए। इसके अलावा दूसरी सुविधाओं के लिए 2.3 लाख रुपए खर्च हुए। गौरतलब है कि बीजेपी नीत केंद्र सरकार ने समेकित गंगा संरक्षण मिशन के लिए नमामि गंगे अभियान की घोषणा की है। इसके लिए केंद्रीय बजट से 2,037 करोड़ रुपए आवंटित किया गया है।

सोर्स : आरटीआई कार्यकर्ता गोपाल प्रसाद की फेसबुक स्टेटस

Friday, 13 March 2015

गालिब : हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन ...

मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ 'ग़ालिब' का जन्म 27 दिसंबर 1796 – 15 फरवरी 1869 को हुआ था। आपकी तारीफ में बस इतना कि आपने उर्दू और फ़ारसी को एक नई पहचान दी। इस बात का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि आपके नाम और शायरी से उर्दू जबान का बच्चा-बच्चा वाकिफ है। गालिब ऐसे शायर भी हैं जिन्हें भारत और पाकिस्तान, दोनों मुल्कों के लोग बराबर तवज्जो देते है। गालिब की शायरी के मिजाज को ऐसे भी समझ सकते हैं कि कई साल पहले कहे उनके शेर आज भी मौजूं मालूम पड़ते हैं। आज हम आपको इस महान शायर का एक पूरा कलाम और चंद मशहूर शेर पढ़ा रहे हैं, मुलाहिजा फरमाइएगा -


तस्कीं को हम न रोएं जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले
हुरां-ए-ख़ुल्द में तेरी सूरत मगर मिले।

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यों तेरा घर मिले।

साक़ी गरी की शर्म करो आज वर्ना हम
हर शब पिया ही करते हैं मेय जिस क़दर मिले।

तुम को भी हम दिखाए के मजनूँ ने क्या किया
फ़ुर्सत कशाकश-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ से गर मिले।

लाज़िम नहीं के ख़िज्र की हम पैरवी करें
माना के एक बुज़ुर्ग हमें हम सफ़र मिले।

आए साकनान-ए-कुचा-ए-दिलदार देखना
तुम को कहीं जो ग़लिब-ए-आशुफ़्ता सर मिले।

*********

उनको देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक,
वह समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
दिल को खुश रखने को 'गालिब' ये ख्यालअच्छा है।

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इशरते-सोहबते-खूबां ही गनीमत समझो,
न हुई 'गालिब' अगर उम्रे-तबीई न सही।

**********

उजाला तो हुआ कुछ देर को सहने-गुलिस्ताँ में,
बला से फूँक डाला बिजलियों ने आशियाँ मेरा।

**********

उम्र फानी है तो फिर मौत से क्या डरना,
इक न इक रोज यह हंगामा हुआ रखा है।

**********

एक हंगामे पै मौकूफ है घर की रौनक,
नौहा-ए-गम ही सही, नग्मा-ए-शादी न सही।

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कर्ज की पीते थे मय, लेकिन समझते थे कि हाँ,
रंग लायेगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।

Thursday, 12 March 2015

टांडा: कई पीढ़ियों से रामनामी गमछे के काम में लगा है मुस्लिम परिवार

शाह आलम।
कहानियां हमेशा दो तरह की होती हैं, एक ऐसी कहानी जिसका वजूद तो नहीं होता, लेकिन गढ़ दिया जाता है। इसे जहर के कारोबार के लिए सुनाया जाता है और इसका खूब ज़ोर-शोर से प्रचार भी किया जाता है। कुछ कहानियां ऐसी भी होती हैं जिनके जिंदा किरदार होते हैं, लेकिन साझी विरासत की इन कहानियों को उतनी दिलचस्पी से सुनाया नहीं जाता। इस खतरनाक समय में हम आपको ऐसी ही कहानी के एक किरदार से मिलवा रहे हैं, जो बड़ी खामोशी से अपने काम में जुटे हुए हैं। हालांकि बदलते माहौल से परेशान वे भी हैं। बहरहाल, हमारी साझी विरासत का एक गाढ़ा यकीन है अंबेडकर नगर के इस शख्स की कहानी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में अंबेडकर नगर नाम का एक जिला है। यहां का एक कस्बा 'टांडा' बुनकर नगरी के रूप में भी जाना जाता है। वैसे आपने टांडा का नाम सांप्रदायिक दंगों के कारण भी सुना होगा। टांडा का जो किस्सा हम आपको बताने जा रहे हैं वह उस सांप्रदायिक अस्तित्व पर करारी चोट करने के लिए काफी है। बताते चलें कि टांडा में कई तरह के कपड़ों की बुनाई की जाती है। लेकिन यहां कपड़ों पर छपाई का काम केवल एक ही परिवार करता है। बुनाई के अधिकांश काम में यहां के कई मुस्लिम परिवार लगे हैं। कपड़ों पर छपाई का काम करने वाले परिवार के मुखिया 60 वर्षीय अब्दुल वहीद हैं। अब्दुल उसी रामनामी गमछे पर छपाई का काम करते हैं, जिसे ओढ़कर आपने अक्सर दंगाइयों को अमन के खिलाफ काम करते हुए देखा होगा। अब्दुल का यह का पुश्तैनी पेशा है, वे अपने इस पुश्तैनी काम पर गर्व करते हैं। अब्दुल बताते हैं कि किस तरह उनके परिवार में यह पेशा पीढ़ी दर पीढ़ी होते हुए उन तक पहुंचा। यहां टांडा में अब्दुल की पहचान उनका पेशा और रामनामी गमछे का काम ही है। अगर आप ‘टांडा’ में कहीं खड़े होकर इस बारे में दरियाफ्त करें तो आप हैरान हो जाएंगे कि बच्चे-बूढ़े सभी बड़े सम्मान से आपको 'राजा मैदान के पास अब्दुल भाई के यहां पहुंचा देंगे। गौरतलब है कि इस मैदान के नजदीक ही टीन की एक छत के नीचे अब्दुल भाई की दुकान है, जहां वे अपने काम में मशगूल दिखाई पड़ते हैं। अब्दुल भाई बताते हैं कि वे दिन में करीब तीन सौ पीस रामनामी गमछे की छपाई कर लेते हैं। इस काम में उनके घर के बच्चे भी उनका हाथ बंटाते हैं। घर पर भी लगभग 250 पीस रामनामी गमछे की छपाई का काम पूरा होता है। अब्दुल के मुताबिक पूरे परिवार का खर्चा इसी काम से चलता है। उनकी खुशी सिर्फ रामनामी गमछे की छपाई भर नहीं है, बल्कि वे इस बात पर भी काफी खुश होते हैं कि उनका बनाया गमछा देश के कोने-कोने में जाता है। आप भी देश की धार्मिक नागरियों में उनके बनाए गमछे को देख सकते हैं। अब्दुल बताते हैं कि मैं यह काम 45 साल से करता आ रहा हूं। वे एक गमछे की छपाई का एक रुपया लेते हैं। अब्दुल के मुताबिक कम पैसे इसलिए लेता हूं ताकि काम बराबर मिलता रहे और बेकारी न हो। हालांकि टांडा में बदलते हालात से अब्दुल भी काफी सहमे हुए हैं। अब्दुल के मुताबिक ‘इधर एक साल से यहां कब क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। पता नहीं किसकी नज़र लग गई है इस शहर को’ आपस की लड़ाई और ‘गैरजरूरी सियासत’ के चक्कर में यहां के सब काम धंधे बर्बाद हो जाएंगे। इससे हम जैसे गरीब ही परेशान होंगे।

Tuesday, 10 March 2015

एक इलीट बुद्धिजीवी 'रि'टायर्ड महाभियोग #MKataju

अनुज शुक्ला। इतिहास तो ऐसे ही लिखा जाता है न। जरूरी नहीं कि किसी बात से सब सहमत हो। भाई जी असहमति के भी अपने तर्क हैं। आप भले समझे कि बात बेदम - बेतुकी है लेकिन तर्कहीन बात करने वाला भी अपनी बात की वजनदारी में सौ साक्ष्य गिना देगा आपको, बस गिनती सिख लो जी आप। अपनी-अपनी बहस अपने-अपने तर्क, आप अपना खेमा चुन लीजिए - अपनी सुविधा के अनुसार। बहरहाल, जब बात बेतुक, बेदम ही हो रही है तो इस तर्कहीन गपशप का एक विषय आज अपने काटजू साहब को बना लेते हैं। वे फिलहाल ताजगी के लिए कैलिफोर्निया में हवाखोरी कर रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर आप उनके धड़ाधड़ फेसबुक अपडेट को लेकर यह बिल्कुल न समझिए कि अमेरिका उनकी रूह में ही धंस गया है। भाई वे जज हैं, और वो क्या कहते हैं - कानून की भाषा में फ्रीडम ऑफ स्पीच का इस्तेमाल और उसकी सीमा जानते हैं। अपनी जबान, अपना इतिहास और अपने तर्क। अब तर्क है तो है- क्या कर लोगे साब। हां, तो मूल बात यो है कि साहब ने कल गांधी जी की ऐसी की तैसी कर दी, बेचारे - महात्मा, कितने दीवाने हैं लोग उनके। गांधी तो आदती हो गए हैं इन सब चीजों के लिए, भला हो हिन्दुस्तान का। लेकिन अपने सुभाष, उन्होंने ये बात ना सोची होगी कि कोई भला यूँ नाप देगा उन्हें भी। हुआ यूँ कि आज काटजू साहब ने फेसबुक पर एक स्टेटस लिखा कि 'गांधी ब्रिटिश के और सुभाष चंद्र बोस जापान के एजेंट थे। दोनों भारतीयों के हित के लिए नहीं बल्कि विदेशी शक्तियों के लिए काम कर रहे थे।' इस स्टेट्स के बाद तो साहब इतिहासकारों की बाढ़ सी आ गई, उनके वाल पर। कई कमेंट, कई विचार और अपनी सहमति-असहमति। कुछ देर बाद फिर दूसरा काटजू पोस्ट- कि कैसे सुभाष जापानी एजेंट थे। काटजू कहते हैं कि अगर वे जापानी एजेंट नहीं थे तो जब जापानियों ने सरेंडर कर दिया तो उन्होंने भी क्यों सरेंडर कर दिया। वे ब्रिटिशर्स के खिलाफ गुरिल्ला लड़ाई जारी रख सकते थे। क्या जापान जीतता तो आप दावे से कह सकते हैं कि वह भारत को आजादी दे ही देता? नहीं, वे भारत को जापानी उपनिवेश बनाते और यहाँ के संसाधनों का दोहन करते। वास्तव में बोस को जापानी इस्तेमाल कर रहे थे। इसमें कोई शक नहीं कि बोस एक बहादुर और व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार आदमी थे। लेकिन वे जापानी फ़ांसीवाद के एजेंट ही साबित होते हैं। (अब फ़ांसीवाद मत पूछना यार मुझसे) देखा, बस कुछ देर में ही काटजू ने कैसे एक इतिहास के अध्याय को बांच दिया। मनोरंजन के लिए गालिब का शेर भी छोड़ दिया अगले दिन तक के लिए - शेर कुछ यूँ है - गालिब हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफान किए हुए नोट- कुछ स्क्रीन शॉट चीजों को समझने के लिए नहीं मजे लेने के लिए। भाई इतिहास नए तरह का बनाया जा रहा है, फ़्रेश और वायरल कंटेंट से आप भी रिच होइए और नीचे कमेंट बॉक्स में अपना विचार भी छोड़िए। कसम से, नींद आ रही है नहीं तो इसे और बढ़िया बना के पढ़ाता बॉस, अब जो है उसी से काम चलाइए। गुड नाइट :P

Monday, 9 March 2015

इब्तिदाए इश्क में रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है क्या?

अनुज शुक्ला।
तो भाजपा का डूबना तय है। शुरुआत दिल्ली ने की है। पुख्ता करने की कोशिश जम्मू-कश्मीर में हुई। अब बारी पश्चिम बंगाल और बिहार की है। एक कहावत है कि दूध से जली बिल्ली मठा भी फूंक-फूंक कर पीती है। लेकिन भाई ये कहावत बीजेपी पर लागू नहीं होती। इसकी एक वजह तो यह है कि साहब आप इन्हें बिल्ली न कहें! शेर हैं भाई ये, और दूसरी बात मोदी-अमितमय भाजपा के विज़न पर उंगली मत उठाइए। सपने बुनना। जनाब हिंदुस्तानियों के लिए सपने से बेहतर क्या? मन की बात कीजिए आप तो। सुनने में आ रहा है कि भाजपा वाले दीदी के बेंगाल में भगवा जादू चलाने के चक्कर में लग गए हैं। किरण बेदी का सबक तो बीते जमाने की बात हुई साब। अब तो जमाना ऐसा है कि ट्विटर पर जो चहचाइएगा, बच्चा-बच्चा वही जबान बोलेगा- बिल्कुल मन के बात सरीखी। बहरहाल, ये राम रोना फिर कभी। सुनने में ये आ रहा है कि बंगाल में भाजपा एक साफ छवि और ठीक-ठीक किरण बेदी की तरह ही कोई मल्टी टैलेंटेड चेहरा ढूढ़ रही है। कहा तो यह भी जा रहा है कि उसकी यह खोज पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली के रूप में समाप्त भी हो गई है। साब, आपको बता दें कि सत्याग्रह नाम की एक हिन्दी वेबसाइट ने अपनी इनसाइड स्टोरी में इसी लब्बोलुबाब की एक रपट प्रकाशित की है। जिसका कहना है कि अमित शाह (निश्चित ही मोदी भी) चाहते हैं कि बंगाल का चुनाव बाबू मोशाय के नेतृत्व में लड़ा जाए। उन्हें सीएम का कैंडीडेट बनाने की योजना है जनाब। रपट में यहाँ तक कहा गया है कि भाजपा यह प्रयोग कई और राज्यों में करना चाहती है। ऐसे राज्यों में जहाँ, भाजपा के पास कोई मशहूर नेता नहीं है वहाँ किसी लोकप्रिय चेहरे के नेतृत्व में भाजपा चुनाव लड़ना चाहती है। रपट के मुताबिक वर्ल्ड कप के बाद गांगुली के हाथों बंगाल भाजपा की औपचारिक कमान सौंप दी जाएगी। यानी कि पार्टी विद डिफरेंस अब सत्ता हथियाने के लिए अपने ही काडर और सिद्धांतों को किनारे रखकर पॉप्युलर किस्म की राजनीति का सहारा ले रही है। वैसे भी, जम्मू-कश्मीर की मोहब्बत के बाद अब सिद्धांत का क्या रोना। गांगुली जी को चुनाव तक अग्रिम बधाई। आप तो साहब इस शेर का मजा लीजिए- इब्तिदाए इश्क में रोता है क्या, आगे आगे देखिए होता है क्या?

‪जब दबंग, सिंघम देख सकते हैं तो #‎दमलगाकेहईशा‬ क्यों नहीं

#अनुज शुक्ला। कभी आपने भारतीय टीम को ऐसे गेदबाजी करते हुए देखा है. भारतीय टीम ने शुरू में शानदार गेदबाजी करते हुए विरोधी टीम के धडाधड आठ विकेट गिरा दिए हैं, विपक्षी टीम ने मात्र 90 या 100 रन बनाए हैं. लेकिन भारतीय गेदबाजों द्वारा बनाया गया यह रोमांच तब हवा हो जाता है, जब विरोधी टीम का 10वां विकेट गिरते-गिरते स्कोरबोर्ड पर 175, 200 भी मानने में कोई हर्ज नहीं :p - से ज्यादा रन टंग जाते हैं. क्रिकेट का यह काल्पनिक उदाहरण (हालांकि भारतीय टीम ने इस तरह का प्रदर्शन कई बार किया है) हालिया रीलिज #दमलगाकेहईशा के लिए है. कुल मिलाकर स्टोरी, एक्टिंग और लोकेशन के लिहाज से यह एक बेहतरीन फिल्म है. जिस दौर की और जहां की कहानी है उसे दिखाने के लिए इसमें छोटी-छोटी बातों का भी काफी ख्याल रखा गया है. कमाल ही कहेंगे इसे. जो कुछ रचा गया है. लेकिन इंटरवल के बाद पता नहीं क्यों फिल्म धीरे-धीरे
बहुत कमजोर हो जाती है. इसका एक कारण यह हो सकता है कि डायरेक्टर महोदय समय के अभाव में घड़ी का दबाव नहीं झेल पाए (अपने यहां एक बड़ी दिक्कत समय की है, फॉर्मूला बन गया है की फला समय में फिल्म ख़त्म हो जानी है) और पिक्चर ख़तम होते-होते एक अच्छी कहानी पूरी करने में जल्दबाजी की गई और कई अनुपयोगी चीजें थोप दी गई. नतीजा इंटरवल के बाद कहानी इतनी तेज हो गई कि एक शानदार नशा चढ़ने से पहले ही उतर गया. शुरुआती आनंद का पूरी तरह कबाड़ा कर डाला. थोड़ा और समय देना था न भाई, जब कहानी ऐसी चुनी थी तो. फिर भी पूरी टीम को दिल से बधाई- भूमि कमाल हो तुम यार. और सबसे ज्यादा बधाई भाई आयुष्मान खुराना को. इन्हें भूमि से कमतर बिल्कुल न आंकिए इस फ़िल्म में. विकी डोनर के बाद इस फिल्म से उनके करियर को गति मिलेगी. पुनश्च : सॉरी अन्ना भाई. इस फ़िल्म से उत्तर भारतीय बैकग्राउंड के लोग ज्यादा जुड़ेंगे. जब आप दबंग, सिंघम और पता नहीं क्या-क्या देख सकते हैं, तो इसे भी देख ही लीजिए. इसलिए कि ऐसी फिल्मों का बनते रहना भी तो जरूरी है. और हां कुमार शानू को ट्रिब्यूट देना तो ठीक था भाई लेकिन संघ की ली क्यों. भाजपाई शानू को स्क्रिप्ट सुनाया था क्या आपने :p नोट : ये मोबाइल समीक्षा है। 6 इंच के कीबोर्ड पर अब इससे अच्छा कुछ और नहीं लिख सकता। बच्चे की जान लोगे क्या यार। :)

Sunday, 1 March 2015

#सिर्फएकट्रेनबम्बईपहुंचासकतीहैसोचाहीनहींकभी

अनुज शुक्ला. जब मैं कॉलेज में था, तो मैं एक भ्रम (भ्रम अब मानता हूँ :p) का शिकार हो गया था. पहला भ्रम यह था कि निराला को मुझसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता. और दूसरा भ्रम जो मैंने पाला वह खुद के आला गीतकार होने का था. बहरहाल, कॉलेज निकलने के कुछ ही दिनों में पहला भ्रम टूट गया लेकिन दूसरा वाला भ्रम कई दिनों तक मेरे पीछे पड़ा रहा. इस बीच भोजपुरी सिनेमा में भी काफी क्रांतिकारी :p बदलाव हो रहे थे, मैंने भी सोचा कि कुछ पॉपुलर किस्म का लिखा जाए, लिखा भी मैंने ( गवाही Arimardan​ और jitendra से ली जा सकती है, मेरी कविताई के कारण इनकी कई रातें खराब हुई). दौरे भी पड़ने लगे. लड़कियां नहीं कविता के चक्कर में कई-कई किमी पैदल कछारों में टहल आता. कुछ हाशिए के साहित्यकारों (स्वाभाविक रूप से इनमें कवि ज्यादा थे) की गोष्ठियां अटेंड करने लगा. हर इलाहाबादी कवि की तरह खुद की नजर में उम्दा ही लिखा (अभी भी इस पर मैं शक नहीं करता). फिर लगा कि बम्बई निकल जाऊ, जो लिखा जा रहा है वह अच्छे से में भी कर सकता हूं. डायरियां भरता रहा और सिर्फ सोचता ही रहा. कभी यह दिमाग में नहीं आया कि बम्बई एक ट्रेन पकड़कर पहुंचा जा सकता है. या मैंने सोचना नहीं चाहा. बहरहाल, एक दिन पद्य से ही जी भर गया. पूरी डायरी फाड़ कर जला दी. जितना दिमाग सहेज सकता था, याद उतना ही रह पाया (आज भी याद है तमाम). यदा-कदा कभी कभार कह लेता हूँ एकांत में अब भी, बहुत जरूरी लगा तो ही नोट करता हूँ. आज अच्छा लगता है जब मेरी तमाम पुरानी कविताएं किसी धन्य युवा कवि के काम आ जाती हैं. पुनश्च : Keshaw Dubey​ अबकी दिल टूटा तो कुछ खतरनाक जलेगा, इतना समझ के रखियो