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Tuesday, 4 November 2014

फितरत बाजी नहीं तो बचपन क्या, कमाल की है यह फिल्म

अनुज शुक्ला. गट्टू जो है ये अपना, कई मामलों में 'साहेब' से भी आगे आला दर्जे का उस्ताद है. गट्टू की उम्र अभी बहुत नाजुक है और दुर्भाग्य से वह एक फ़िल्मी चरित्र है, नहीं तो उसमें नेतृत्व की जन्मजात महान संभावनाओं का हमारे लोकतंत्र में बेहतर इस्तेमाल हो जाता. दरअसल 'गट्टू'
साल 2012 में रिलीज हुई एक फिल्म है. पिछले दिनों मित्र अल्केश ने यह फिल्म दी. करीब अस्सी मिनट लम्बी इस फिल्म को राजन खोसा ने निर्देशित किया है. एक शानदार फिल्म रुड़की की कहानी है जिसका केन्द्रीय पात्र गट्टू नाम का पैर से विकलांग बच्चा है. इस नौ साल के बच्चे का किरदार मास्टर मोहम्मद समद ने निभाया है. गट्टू की उम्र तो बहुत छोटी है लेकिन अपना काम निकालने के लिए यह शरारती बच्चा बड़े-बड़े लोगों को भी उल्लू बनाने में सक्षम है. इस फिल्म को देखकर कह सकते हैं कि वाकई अगर फितरतबाजी नहीं है तो फिर बचपन का क्या मतलब. कबाड़ की दुकान पर काम करने वाले इस बच्चे को पतंगे उड़ाने का शौक है. वह पैसे चुराकर अपने इस शौक को पूरा करता है. हालांकि हर बार उसकी पतंग एक काली पतंग से कट जाती है. पूरे रुड़की के पतंगबाजों में इस काली पतंग का खौफ है. गट्टू तय करता है कि वही एक दिन इस काली पतंग को काटेगा. हालांकि उसे ऐसा करने के लिए उंचाई की जरूरत है और पर्याप्त उंचाई उसके मोहल्ले के करीब के सरकारी स्कूल की छत से ही मिल सकती है. उसके इरादे साफ़ है वह चोरी से एक ड्रेस जुगाड़ स्कूल में पहुंच जाता है. यहाँ उसे दो तीन मित्र भी मिलते हैं. कुछ दिन स्कूल आने-जाने में वह स्कूल को अच्छी तरह समझ लेता है. अब दिक्कत यह है कि वह स्कूल की छत से पतंग कैसे उड़ाए? क्योंकि छत से प्रिंसिपल का पोता गिरकर मर चुका था इसलिए उसे बंद कर दिया गया है. इस बीच स्कूल में जो गट्टू के मित्र बने हैं वे किताबों की चोरी के मामले को लेकर गट्टू को धमकानेलगते हैं. लेकिन संभावनाओं से ओत-प्रोत गट्टू उन बच्चों को यकीन दिलाता है कि स्कूल पर आतंकवादी हमले की साजिश हो रही है और वह एक जासूस है जो इसे नाकाम करने के लिए मिशन के तहत स्कूल आया हुआ है. आतंकवादियों के हमले को रोकने के लिए उसे अपने अधिकारियों को संकेत देना पड़ेगा, संकेत के लिए आसमान में पतंग उड़ाना पड़ेगा. ऐसा करने के लिए स्कूल की छत पर जाना पड़ेगा. गट्टू स्कूल की छत पहुंचता है, जाहिर सी बात है कमाल की प्रतिभा के धनी गट्टू अपने मंसूबे में कामयाब भी हो जाता है. अरे भाई काली पतंग कट जाती है. गट्टू की पोल भी खुलती है. गट्टू अपना काम कर निकल जाता है लेकिन उसके दोस्त पकड़े जाते हैं. दोस्तों को लेकर गट्टू को अपनी गलती का यकीन होता है और चीजों को ठीक करने स्कूल लौटता है. आमतौर पर जैसा फिल्मों में होता है वैसे ही प्रिंसिपल उससे प्रभावित होते हैं और गट्टू के स्कूल में दाखिले के साथ कहानी का सुखद अंत होता है. कई फिल्म समारोहों में सराही गई यह फिल्म का निर्माण चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी ने किया है. अगर इस फिल्म को नहीं देखा है तो एक बार जरूर देखना चाहिए. बहरहाल, फिल्म देखने के बाद अब मैं यही सोच रहा हूँ कि गट्टू अगर असल चरित्र होता तो...