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Wednesday, 15 June 2011

ज्योतिर्मय डे की हत्या से उठे सवाल

अनुज शुक्ला –
पाकिस्तान में पत्रकारों पर हो रहे हमले के आलोक में भारत के कई मंचों पर अखबारों और पत्रकारों पर हिंसात्मक कार्रवाइयों के बढ़ते स्तर को लेकर बहस चल ही रही थी कि मुंबई में एक पत्रकार; पेशागत ईमानदारी के चलते अपराधियों की भेंट चढ़ गया। खोजी पत्रकारिता के जरिए कई आपराधिक एवं भ्रष्टाचार से जुड़ी कारगुजारियों की पोल खोलने वाले, मिड डे के वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे को माफियाओं ने दिन दहाड़े गोलियों से भून डाला। ज्योतिर्मय डे के साथ हुआ यह हादसा महाराष्ट्र में मजबूत हो चुके माफियातन्त्र का एक नया नमूना है, जिसने अवचेतन में चले गए पुराने सवालों को फिर से जिंदा कर दिया है।
डेढ़ साल पहले पुणे में भूमि घोटाले को उजागर करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता सतीस शेट्टी की हत्या और पाँच महीने पूर्व नासिक के ईमानदार सहायक कलेक्टर यशवंत सोनावड़े को तेल माफियाओं द्वारा जिंदा जलाने की घटना, महाराष्ट्र के माफिया तंत्र और प्रशासन के गठजोड़ का एक पुख्ता सबूत है। पाँच महीने के अंदर पुलिस और सीबीआई सोनावड़े के हत्यारों के खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल नहीं कर पाई। सतीस शेट्टी के केस की भी प्रगति बहुत ठीक नहीं है, जांच ठीक ढंग से नहीं किए जाने के कारण रसूखदार अपराधी कानूनी दायरे से बाहर हैं। जाहिर है कि इन घटनाओं से जहां माफियाओं की उदण्डता उजागर होती है तो वहीं महाराष्ट्र के सरकारी तंत्र की कलई भी खुलती है। ज्योतिर्मय डे की हत्या में यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि इसके भी तार आपराधिक सरगनाओं या तेल माफियाओं से जुड़े हुए हैं। सनद रहे कि ‘मिड डे’ में प्रकाशित ज्योतिर्मय डे की रिपोर्टों के आधार पर कई अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई है।
दरअसल अन्य राज्यों के मुक़ाबले महाराष्ट्र में आए दिन पत्रकार, आरटीआई कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता अपराधियों, माफियाओं और पुलिसतंत्र के हमलों के शिकार होते आए हैं। ज्योतिर्मय डे की हत्या से लगभग सालभर पहले सरकार की पोलखोलने वाले पत्रकार हेमंत पांडे को नागपूर में पुलिसतंत्र ने नक्सली बताकर फर्जी एनकाउंटर में मार दिया था। जिसपर अदालत में मामला विचाराधीन है। मुंबई के एक दूसरे पत्रकार सुधीर धवले को नक्सली होने के आरोप में छ महीने पहले से वर्धा स्टेशन से उठाया गया था, वो अभी तक जेल में बंद हैं। एक लंबे समय से कई अखबार और पत्रकार शिवसेना जैसी सांप्रदायिक ताकतों का गुस्सा झेलते आ रहें हैं। जाहिर है कि महाराष्ट्र के मौजूदा हालात पत्रकारों के अनुकूल नहीं कहे जा सकते हैं। महाराष्ट्र राज्य में प्रचुर मात्रा में भ्रष्टाचार और अपराध के मामले उजागर होते रहते हैं। इनपर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर खतरे की संभावना हमेशा बनी रहती है।
ध्यान दे तो ये सारी घटनाएँ सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार को उजागर करने या सच्चाई के साथ खड़े होने के कारण घटित हुई हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अपराध के इन खेलों में सफेदपोश लोगों का प्रश्रय न हो। हर बार बड़ी मुर्गियों तक कानूनी हाथ पहुँचते-पहुँचतेरूक जाता है। यशवंत सोनावड़े की हत्या के वक्त ही, महाराष्ट्र के कुछ संगठनों ने तेल और जमीन के गोरखधंधे में बड़े कारकुनों की संलिप्तता को लेकर मांग की थी कि पूरे मामले की बड़े स्तर पर जांच की जाय ताकि दागदारों का चेहरा उजागर हो सके। जांच की प्रक्रिया और उसकी गति क्या रही इसे सोनावड़े के केस में सीबीआई द्वारा चार्जशीट तक नहीं दायर करने से समझा जा सकता है। अब डे की हत्या के बाद महाराष्ट्र के गृह मंत्री आर.आर. पाटील की रिरियाहाट को कैसे सत्य मान लिया जाय कि अपराधियों को बख्शा नहीं जायेगा?
महाराष्ट्र में सांगठानिक अपराधों को राज्य की मशीनरी ने गुप्त रूप से प्रश्रय दे रखा है। यानी बड़े पैमाने पर अपराधियों को सफेदपोश चेहरों का वरदहस्त प्राप्त है। यह एक बार नहीं कई मर्तबा साबित हो चुका है। जाहिर है कभी कोई ऐसा उदाहरण ही नहीं देखने को मिला जिसमें अपराधियों को सजा मिली हो। कई मामले में अपराधी चार्जशीट के अभाव में बरी हो जाते हैं। फलस्वरूप अपराधी दिनदहाड़े आपराधिक कृत्यों को अंजाम देते हुए हिचकिचाते नहीं। पब्लिक है कि घटना के वक्त गुस्से और सदमे में रहती है लेकिन एक समय के बाद उसकी स्मृति से ये मामले गायब हो जाते हैं।
ज्योतिर्मय डे के की हत्या पत्रकारिता के ऊपर हमला नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार की फैक्ट्री बन चुके महाराष्ट्र के पूरे सिस्टम पर एक बड़ा सवाल है। क्या पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, आरटीआई कार्यकर्ता अपने काम की कीमत अपनी जान से चुकाएंगे, उनके ऊपर हमले किए जाएंगे? क्या सरकार दो मीनट की ‘भर्त्सना-बाइट’ से मुक्त हो जाएगी। डे की हत्या भविष्य में मुक्त पत्रकारिता को लेकर आशंकित करती है। यदि मामले की तह में जाकर अपराधियों को पकड़ कर सजा नहीं दी गई तो भविष्य मेँ अन्य दूसरे पत्रकारों पर जानलेवा हमलों की घटनाओं में इजाफा होगा।
anuj4media@gmail.com

Thursday, 9 June 2011

उमाभारती की वापसी के मायने



अनुज शुक्ला -
छः सालों से भाजपा में वापसी को लेकर चल रही अटकलों पर उस समय विराम लग गया जब दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उमा भारती का स्वागत करते हुए पार्टी में पुनर्वापसी की आधिकारिक घोषणा की। उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन तलाश रही भाजपा ने चुनाव के ठीक एक साल पहले उमा की वापसी और प्रदेश की बागडोर सौपे जाने की कवायद भविष्य की कई राजनीतिक संभावनाओं का संकेत मात्र है। इसे उत्तर प्रदेश में भाजपा की भगवा ब्रांड की आक्रामक राजनीति की पुनरावृत्ति भी मानी जा सकती है। जाहिर है उमा भारती उग्र छवि की नेत्री मानी जाती हैं। जो 90 के दशक के राम मंदिर आंदोलन की अगुवा की भूमिका में रह चुकी हैं।
पिछले सात सालों में कांग्रेस की नर्म हिन्दुत्व की राजनीति एवं बसपा की सोशल इंजीनियरिंग की गणित, भाजपा के जनाधार को मटियामेट कर चुकी है। उमाभारती उत्तर प्रदेश में उस समय वापसी कर रहीं हैं जब प्रदेश में भाजपा के औचित्य पर ही सवाल उठने लगे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो पार्टी, जनाधार और नेतृत्व, दोनों तरह के संकट से गुजर रही है। प्रश्न होना भी चाहिए कि आखिर उमाभारती की वापसी के मायने क्या हैं? आखिर किन शर्तों पर उमा की पार्टी में वापसी पर, लगातार विरोध कर रहे अगड़ी जाति के नेता राजी हुए हैं?
दरअसल यह संघ प्रमुख भागवत के दबाव के कारण संभव हो पाया है। दूसरी ओर नितिन गडकरी की सहमति, उमा की वापसी के माध्यम से पार्टी के विरोधी गुट को दिया गया एक संदेश भी माना जा सकता है। इसके पीछे अन्य दूसरे राजनीतिक-कूटनीतिक कारण हैं। प्रदेश में भाजपा के कद्दावर नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई में भाजपा लगातार पीछे होती गई। कभी उत्तर प्रदेश में मिलें सीटों के सहारे दिल्ली में बड़े दल होने के फायदा भाजपा को मिलता रहा है। अब जबकि उसके मूल प्रदेश में ही सीटों की संख्या में कमी आती गई सो भाजपा के सहयोगियों में भविष्य के राजनीति की ढेरों आशंकाएँ स्वाभाविक रूप से पैदा होती गईं । जाहिर है अगर प्रदेश में भाजपा की मौजूदा स्थिति नहीं सुधरती है तो उसके पास मध्य प्रदेश और गुजरात ही ऐसे दो राज्य बचते हैं जहां से ठीक-ठाक संख्या में पार्टी सीट पाने की गुंजाइश रख सकती है। शेष राज्यों में भाजपा की सीटों का विशेष मतलब ही नहीं रह जाता है। उदाहरण के लिए अगर दिल्ली, छत्तीसगढ़, हिमांचल और उत्तरांचल से मिलने वाली सीटों का आंकड़ा निकाला जाएगा तो पार्टी, तत्काल बहुत फायदे में नजर नहीं आ रही है। दूसरी ओर कम सीटों के कारण गठबंधन पर असर पड़ने की संभावना दिन ब दिन बलवती होती जा रही है।
महाराष्ट्र में शिवसेना के तेवर देख कर ऐसा नहीं लगता कि वह 2014 के चुनाव को भाजपा के साथ लड़ेगी। बिहार में नितीश उस स्थिति में पहुँच गए हैं कि सीटों के बटवारे पर अपनी मर्जी से निर्णय लेने को भाजपा को मजबूर कर सकते हैं अन्यथा कॉंग्रेस नितीश को अपने पाले में खीचने की लगातार कोशिश कर ही रही है। यानी खुद भाजपा के वजूद के लिए यह जरूरी हो गया है कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से वह अपनी राजनीतिक साख को बचाने का विकल्प तलाशे।
जहां तक उमा भारती की वापसी का प्रश्न है, यह साफ है कि उनकी वापसी एक खास रणनीति के तहत हुई है। उमा भारती को बहुत ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। दरअसल उमा भारती की वापसी पर इस बार असंतुष्टों का चुप रहना भाजपा के गंभीर रहस्यमयी राजनीति की ओर इशारा कर रही है। भाजपा को यह पता है कि प्रदेश में वापसी कर पाना लगभग नामुमकीन है, उमा के माध्यम से वह ‘चित भी मेरी और पट भी मेरी’ की गणित के तहत काम कर रही है। अगर उमा की महिला, पिछड़ा-दलित समर्थक, फायर ब्रांड हिन्दुत्व की छवि काम कर जाती है तो पार्टी को फायदा मिलेगा ही। अन्यथा हारने पर खुद ब खुद उनकी भूमिका शून्य हो जायेगी। एक तरीके से स्वतः राजनीतिक हत्या हो जायेगी। बहरहाल, कुछ भी हो लेकिन एक बात तय है कि अपनी खास छवि के लिए पहचानी जाने वाली उमा भारती के भाजपा का नेतृत्व संभालने से प्रदेश की राजनीति में संप्रदायीकरण को खूब हवा मिलेगी। पुनर्वापसी के वक्त प्रेस कोंफ्रेस में उन्होंने इशारों में इसे व्यक्त भी किया। उमा के ही शब्दों में ’प्रदेश को रामराज्य में ले जाने की इच्छा है, उत्तर प्रदेश राम और रोटी का राज्य है’ यानी उमा भारती पुनः धर्म से जुड़े भावनात्मक मुद्दों को हवा देंगी। गौरतलब है कि भाजपा से दूर रहते हुए भी उन्होंने राममंदिर की तर्ज पर हरिद्वार से गंगा मुक्ति जैसे धार्मिक आंदोलनों का नेतृत्व किया है। एक अंतराल पर संघ के स्वभाव के विपरीत, साध्वी दलित और पिछड़ी राजनीति भी करती आई हैं। अतीत में आरक्षण के मुद्दे पर उनके बयान विवादास्पद रहे हैं। प्रेस कोन्फ्रेंस में उन्होंने ‘उत्तर प्रदेश को मण्डल और कमंडल का राज्य’ कहकर दलित और पिछड़े मतों को पुचकारने का प्रयास भी किया।
जाहिर है कि उमा के इस बयान से भविष्य की योजनाओं का खुलासा होता है। यानी हिन्दुत्व की सांप्रदायिक राजनीति के अलावा दलितों और पिछड़ों के भाजपाईकरण का भी प्रयास होगा। अपनी इसी राजनीति के सहारे उमा भारती ने मध्यप्रदेश में कांग्रेस को जोरदार तरीके से हराया था। प्रदेश के सभी दल यह मान कर चल रहे हैं कि सबका मुक़ाबला मायावती से ही होना है, लिहाजा भाजपा के लिए उमा का महिला होना, उग्र हिन्दुत्व की छवि, पिछड़ी जाति से आना; कई ऐसे मूलभूत गुण है जिनके कारण पार्टी पुनः उमा-राग गाने को विवश हुई है। देखना यह है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में अपने मंसूबों को लेकर कितना सफल होती है।


anuj4media@gmail.com

Tuesday, 7 June 2011

आतंक, म्लाडीच और मीडिया

अनुज शुक्ला-

मीडिया के लिए आतंक से जुड़ी खबरें हमेशा ही फायदेमंद साबित होती रही हैं। दो दशकों में मीडिया ने आतंक को लेकर ऐसा आभासी संसार गढ़ दिया है जिसमें टीवी के लिए आतंक से जुड़ी हुई खबरें टीआरपी के लिए बेहतर सौदा साबित होती आईं हैं। अगर साल भर की खबरों का एक औसत निकाला जाय तो शायद आतंक से जुड़ी खबरों पर मीडिया ने अपना सबसे ज्यादा वक्त जाया किया है। 2000 के बाद लगभग सभी ‘एक्सक्लूसिव’ या बड़ी ब्रेकिंग खबरे आतंक से जुड़ी रही हैं। ताजा उदाहरण में साल 2011 की सबसे बड़ी ब्रेकिंग खबर ओसामा के ऊपर अमेरिका का निर्णायक ऑपरेशन रहा। लेकिन अजीब इत्तेफाक है कि ये खबरें तथाकथित ‘इस्लामिक आतंकवाद’ के चेहरे को ही उजागर करती नजर आईं है। यानी पिछले एक दशक की मीडिया रिपोर्टिंग ने आतंकवाद को, इस्लाम के अनिवार्य घटक साबित करने का दुष्चक्र रचता आया।
जबकि इस्लामिक आतंकवाद से ‘फोबियाग्रस्त’ मीडिया के लिए जनरल ‘रात्को म्लाडीच’ जैसों का क्रूरतम अपराध कोई मायने नहीं रखता। भले ही म्लाडीच के ऊपर इतिहास की जघन्यतम हत्याओं में से एक का अभियोग लगा हो। जाहिर है संवेदनशील मुद्दों पर मीडिया की खबरों के पीछे लगी यहूदी उद्यमियों की पूंजी, जनित ‘नस्ली वर्चस्व’ के सिद्धान्त को कायम करती है। अब अपनी साख के लिए संघर्षरत मीडिया से यह अपेक्षा करना कि ’यह अपनी वस्तुनिष्ठता एवं तथ्यात्मकता को बरकरार रखेगी ; महज एक कोरी कल्पना है। क्योंकि मीडिया की सोच या वैचारिकी की निर्मिति का बहुतायत स्त्रोत इस्राइल केन्द्रित, पश्चिमी दृष्टिकोण बना हुआ है। हालांकि समय-समय पर ये खुद को ज्यादा लोकतान्त्रिक और सहिष्णु जतलाते आएं हैं। जिसे पिछले दिनों ट्यूनीशिया, मिश्र एवं लीबिया में हालात के मुताबिक तब्दील हुई इनकी रणनीतियों से समझा जा सकता है।
आतंकवाद को लेकर पश्चिमी जगत ने मीडिया के सहारे एक रहस्यमयी ‘फेनोमेना’ की रचना की है। दरअसल जिस एक हादसे के बाद इस्लामिक आतंकवाद का हौवा, अमेरिकी प्रशासन की निगाह में खटका, उसके मूल में वर्ल्ड ट्रेड पर हमले और उसमें मारे गए अमेरिकियों की मौत का प्रतिशोध था। बहरहाल, कौम चाहे जो भी हो; बर्बरता या आतंक को बचाने को लेकर कोई तर्क नहीं गढ़ा जा सकता। वह चाहे ओसामा हो या ‘जनरल म्लाडीच’। ‘म्लाडीच’ जिसके सिर पर ओसामा से ज्यादा हत्याओं का जघन्य अपराध है। जिसे सूचनाओं के प्रति एकपक्षीय नजरिए के कारण दुनिया के अन्य देश ठीक तरह से परिचित नहीं हो पाए। काबिलेगौर है कि आतंकवाद के खिलाफ अपनी चौधराहट, मानवाधिकारों की रक्षा के संकल्प को दोहराने वाले पश्चिमी जगत का रवैया, क्या हर मामले में न्यायपूर्ण रहता है? वह किस तरीके सूचना-साधनों का इस्तेमाल अपने एजेंडे को स्थापित करने के लिए करता है तर्कसंगत है?
पश्चिमी जगत के लिए आतंक के मुद्दे और परिभाषाएँ क्षेत्रवार कैसे अलग हो जाती हैं इसे मीडिया की उन खबरों से भालिभांति समझा जा सकता है जो इतिहास के क्रूरतम हत्यारे म्लाडीच की गिरफ्तारी के बाद नजर आईं हैं। म्लाडीच ने 1995 में बोस्निया युद्ध के दौरान, ‘स्रेबरेनिका’ के शरणार्थी शिविर में पनाह लिए 7500 बेगुनाह मुसलमानों का कत्लेआम किया, ताकि इस समुदाय से 15 वी शताब्दियों में हुए अत्याचारों का प्रतिशोध ले सके। क्या ‘बेलग्रेड’ में जो भीड़ म्लाडीच को हीरो के तौर पर पेश करती नजर आ रही है, उसे रिहा करवाने के लिए हिंसक झड़पे की जा रही है, वह कैसे कट्टरपंथियों से अलग नहीं है? काबिलेगौर है कि म्लाडीच से जुड़ी वही खबरें मीडिया परोस रही हैं, जो म्लाडीच के पक्ष में हैं। उन्हीं खबरों की फुटेज दिखाई जा रही है जो उसे बचाने से संबंधित हैं। मीडिया, म्लाडीच की बर्बरता के न तो फुटेज दिखा रही है (जैसाकि तालिबान या अलकायदा से जुड़े मामलों में करती आई है) और न ही उस बर्बर समय की कहानी ही नजर आती है। अलबत्ता ओसामा कितना बर्बर था, कितने आतंकी कारनामे किया, आगे के सालों में अलकायदा की क्या रननीतियाँ होंगी; इससे दुनिया का बच्चा –बच्चा परिचित हो चुका है।
सूचना के लिए पश्चिम पर आश्रित मीडिया उसी ‘वायस्ड’ छवि को परोसती है, जो वह आयात करती है। इससे बड़ा अफसोस और क्या हो सकता है कि अधिकांश मीडिया संस्थान परोक्ष या अपरोक्ष रूप से पश्चिमी पूंजी के पंजे में हैं। जैसे भारत में पूंजी एवं पश्चिमी विचार के रूप प्रत्यक्ष प्रवेश है, जहां बार्ंबार खबरों की प्रस्तुति पर इसका दूरगामी असर दिखता है। सरोकार, प्रतिबद्धता एवं भारतीयता की दुहाई देने वाला देशी मीडिया क्या संवेदनशील खबरों की रिपोर्टिंग को लेकर फिक्रमंद है? अलबत्ता वह दुर्लभ जीवों को बचाने के अभियान, टीवी सिनेमा के प्रमोशन एवं प्रायोजित रेसों के आयोजन को लेकर ज्यादा सक्रिय दिखती है। प्रिंट मीडिया जंगल को तो बचाने का मुहिम चलाती है लेकिन अनुचित तरीके से सबसिडी में मिले कागजों का इस्तेमाल खबरों के साथ घपलेबाज़ी के रूप में करती है। दुख इस बात का है कि धर्म विशेष के आतंक की जुड़ी खबरों की मसालेदार प्रस्तुति करने वाली मीडिया जनरल ‘म्लाडीच’ पर कैसे चूक गई?