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Saturday, 21 May 2011

महेंद्र सिंह टिकैत


अनुज शुक्ला –
यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि मौजूदा संसदीय राजनीति में जनहित से जुड़े मुद्दों का पतन हो चुका है। खासकर खेती और किसानी से जुड़े सवालों की रहनुमाई करने वाले अब कम ही बचे हैं। उत्तर प्रदेश के साथ देश के दूसरे हिस्सों की स्थिति लगभग यही है। अधिग्रहणों वाले दौर में, देश एक अदद किसान नेता और ताकतवर किसान संगठन की आस लगाए बैठा है जो उसके संघर्ष को उड़ान दे सके। ठीक इसी समय दमदार किसान हिमायती, ठस देशी पृष्ठभूमि वाले किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु किसानों एवं उनके आंदोलनों के लिए किसी सदमे से कम नहीं। टिकैत ने रविवार 15 मई की सुबह दुनिया को अलविदा कह दिया।
महेंद्र सिंह टिकैत ग्रामीण जीवन में रचे-बसे ऐसे इंसान थे जो पांच दशक की लंबी किसान राजनीति में सक्रिय भागीदारी के बावजूद कभी खुद को सत्ता का मोहताज नहीं बनने दिया। बनिस्पत इसके कि आजकल एक-दो आंदोलनों के सहारे लोग सत्ता की मलाई के चक्कर में लग जाते हैं। टिकैत का जन्म 6 अक्टूबर 1935 को पश्चिमी उत्तरप्रदेश के जिले मुजफ्फरनगर के सिसौली गाँव में एक जाट परिवार, चौधरी चौहल सिंह के घर में हुआ था। बचपन में ही पिता की असमय मृत्यु हो गई और परंपरागत मूल्यों के कारण सात साल की उम्र में टिकैत, प्रसिद्ध बालियान खाप पंचायत के मुखिया बने। टिकैत को अपने जातीय समाज के नेतृत्व करने का मौका पारिवारिक कारणों से मिला। लेकिन आज जिन वजहों से टिकैत को दुनिया जानती है वह खुद इस व्यक्ति के अपने संघर्षों की बदौलत है।
किसान पृष्ठभूमि से जुड़ा होने के बावजूद राजनीति के किसानों के प्रति रवैये से यह व्यक्ति पहले परिचित नहीं था। 1986 में भारतीय किसान यूनियन की स्थापना करते वक्त टिकैत को यह नहीं पता होगा कि जिस संगठन की वह स्थापना करने जा रहे हैं वह आने वाले दशकों में किसानों के हक की आवाज को बुलंद करेगा और किसान आंदोलनों का प्रतीक बन जाएगा। भाकियू की स्थापना के एक साल बाद 27 जनवरी 1987 को करमूखेड़ी बिजलीघर पर बड़ा किसान आंदोलन हुआ, यह टिकैत के नेतृत्व में किया गया पहला आंदोलन था जो बढ़े हुए बिजली की सरकारी दरों से संबन्धित थी। टिकैत के संघर्षपूर्ण रवैये ने सरकार को झुकने पर विवश किया, हालांकि इस संघर्ष में, आंदोलन के दो किसान साथियों की जान गई लेकिन जब आंदोलन खतम हुई तो खेती के काम के संसाधनों की बढ़ती दरें और सरकार द्वारा फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा के नारे पर लाखों किसानों का हुजूम टिकैत के पीछे खड़ा हो चुका था। टिकैत ने बहुत ही कम समय में प्रदेश भर के किसानों को एकजुट करने का काम किया। आज उत्तरप्रदेश के विभिन्न हिस्सों मसलन ग्रेटर नोएडा में पुलिस के नृशंस दमन के बावजूद भट्ठा-परसौल में निडर होकर किसान रोज पंचायते लगा रहे हैं या पश्चिम में जितने भी आंदोलन खड़े हुए उनके पीछे टिकैत द्वारा चलाए गए आंदोलनों का ही विश्वास काम कर रहा है। 87 में करमूखेड़ी के बाद मेरठ में कमिश्नरी आंदोलन, मुरादाबाद में रजबपुर आंदोलन, दिल्ली के वोटक्लब पर किया गया आंदोलन, 1989 में अलीगढ़ में किया गया आंदोलन तथा इसी साल नईमा के अपहरण को लेकर किया गया आंदोलन, उत्तरप्रदेश के किसान आंदोलनों में मील के पत्थर के रूप में गिना जाता है। हालांकि आंदोलनों के प्राथमिक चरण में स्पष्टतः महसूस किया जा सकता है कि इनके आंदोलन के मुद्दे बड़े सहज रहे हैं। टिकैत का मानना था कि सत्ता-संचालक किसानों की समस्याओं को समझे और उसके समाधान के लिए ठोस पहल करे। लेकिन 90 के बाद में टिकैत का आंदोलन ज्यादा परिपक्व कहा जा सकता है। यह दौर किसानों के सामने नए संकट के दौर को लेकर आया। खेती में पूँजीपतियों की गिद्ध-दृष्टि को टिकैत ने पहचान लिया। देश-विदेश के दूसरे किसान नेताओं के साथ टिकैत ने दुनिया भर के मंचों से डंकल प्रस्ताव, गैट और वैश्वीकरण का विरोध किया। इस दौरान जर्मनी, वेल्जियम और फ्रांस जैसे कई पश्चिमी देशों में विरोध प्रदर्शनों और पैदल मार्चों में हिस्सा लिया। विरोध प्रदर्शन के दौरान जर्मनी में गिरफ्तारी भी हुई। टिकैत के साथ काम कर चुके किसान नेताओं का मानना है कि ‘एक दर्जन से ज्यादा की जेल यात्राएं और चार दशक के लंबे किसान संघर्ष ने इस इंसान को किसान आंदोलनों का दूसरा पर्याय बना दिया’।
अच्छे-अच्छों को भी पटखनी देने वाले टिकैत के लिए संसदीय राजनीति का अनुभव कड़वा ही रहा। इस भोले-भाले गवई इंसान को राजनीतिक दलों ने हमेशा ही ठगी का शिकार बनाया। एक तरीके से जहां व्यक्तिगत रूप से टिकैत को इन घटनाक्रमों ने कमजोर किया तो लाखों किसानों के हुजूम का नेतृत्व करने वाले भाकियू की साख को भी बट्टा लगाया। 1989 में वीपी सिंह के लिए जनतादल के पक्ष में अपील की। स्वभाव से धार्मिक होने के कारण 1991 में ‘राम के नाम और आत्मा की आवाज’ का हवाला देते हुए अपरोक्ष रूप से भाजपा का समर्थन किया। टिकैत के समर्थन ने दोनों मर्तबा इन दलों को लाभ पहुंचाया लेकिन सत्ता के गलियारे में जाने के बाद इनका भी रवैया किसानों के प्रति पूर्व की सरकारों की भांति ही रही। कभी दलीय राजनीति के विरोध के नाम पर शेतकरी नेता शरद जोशी से अपने रास्ते अलग करने वाले टिकैत के लिए राजनीतिक दलों को समर्थन देने वाले ये निर्णय, भाकियू की साख में बट्टा लगाने वाले साबित हुए। राजनीति से मिले इन खट्टे अनुभवों के बावजूद 1996 में टिकैत एक बार फिर छोटे चौधरी के राजनीतिक धोखे का शिकार हुए। पुत्रों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने पुनश्च टिकैत को दलीय राजनीति की ओर रूख करने को विवश किया, परिणामतः 2004 में बीकेडी का गठन किया। टिकैत दलीय राजनीति को कभी ठीक तरीके से समझ नहीं पाये।
मौजूदा दौर में जब किसान आंदोलन के विकल्प तेजी से सिमट रहे हैं, किसानों को सरकार और निगम के दो स्तरों पर संघर्ष करना पड़ रहा है ऐसे हालात में किसानों का नेतृत्व करने वाला एवं कभी न हार मानने वाले नेता का जाना एक अपूरणीय क्षति है। तमाम विरोधाभासों के बावजूद आने वाला इतिहास महेंद्र सिंह टिकैत के संघर्ष की अनुगूंज को महसूस करेगा।
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