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Tuesday, 15 February 2011

महिला आयोग की प्रासंगिकता और राजनीति

अनुज शुक्ला –
सरकारी आयोगों की कार्यप्रणालियां हमेशा शक के दायरे में रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर जितने भी आयोग गठित किए गए हैं, उनकी कार्य प्रविधि सत्ताधारी वर्ग के अनुकूल रही है। वह चाहे मानवाधिकार आयोग हो, एससी-एसटी आयोग या अल्पसंख्यक आयोग। राष्ट्रीय महिला आयोग भी इसका अपवाद नहीं। आधी आबादी के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया गया था। बीते वर्षों की काल अवधि गवाह है कि कैसे एक आयोग कस्बाई राजनीति के सर्कस का विदूसक बन चुका है।
आजादी के बाद से स्त्रीवादी कार्यकर्ता, महिलाओं के अधिकारों के सुरक्षा की व्यापक मांग करते आ रहे थे। 1990 के महिला सरंक्षण अधिनियम के तहत 1992 राष्ट्रीय में महिला आयोग की स्थापना की गई। महिला आयोग ने अपनी स्थापना के वक्त जारी घोषणा पत्र में स्त्री की स्वतंत्रता और सुरक्षा का जिक्र किया है। आयोग का मानना था कि अधिकांशतः स्त्री उत्पीड़न ऐसी जगहों पर फलीभूत होता है जहां स्त्रियॉं के सामाजिक - सांस्कृतिक अधिकारों की मनाही की जाती है। लोकतांत्रिक सिविल स्वतंत्रता कहती है कि स्त्री अधिकार मानव की अनिवार्य महत्ता को पहचान देते हैं। जाहिर है आयोग की भूमिका जवाबदेह और पारदर्शी होनी चाहिए। दुर्भाग्य से सिक्के का दूसरा पहलू भी है। पिछले वर्षों में ऐसा कई बार हुआ जब मामलों पर महिला आयोग की भूमिका को देखकर लगा कि अधिनियम में जो बातें कहीं गई हैं उसका अनुशरण खुद आयोग ही नहीं करता। उसकी रिपोर्टे सत्ता – सापेक्ष रही पाई गई।
बहरहाल महिला आयोग की प्रासंगिकता और राजनीति को समझने के लिए दिल्ली और उत्तर प्रदेश से बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। खासतौर से उत्तर प्रदेश में घटित महिला उत्पीड़न के मामले यहा की राजनीति के लिए सुरखाब के पर की तरह काम करते आए हैं । 2010 में दिल्ली महिला उत्पीड़न संबंधी 489 मामले दिल्ली पुलिस ने पंजीकृत किया। इसकी संख्या 2009 के 452 के मुक़ाबले ज्यादा थी। जबकि उत्तर प्रदेश में 2009 के साल 429 मामले, जो दिल्ली से कम थे संज्ञान में आए। दूसरी ओर बाल विबाह, भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ होने वाली उत्पीड़न की राज्यवार घटनाओं की राष्ट्रीय दर चौकाने वाली है। राष्ट्रीय अपराध व्यूरो के अनुसार यह उत्तर प्रदेश में 26.3 % है, जो कांग्रेस शासित आंध्र प्रदेश में 30.3% और संप्रग शासित तमिलनाडु में 33.6% से कम है। राजस्थान और हरियाणा की भी महिला उत्पीड़न की दर में बड़ी हिस्सेदारी है। सवाल उठता है कि महिला आयोग की कवायद इन राज्यों में क्यों शून्य है ? क्या सिर्फ इसलिए कि इन राज्यों में कांग्रेस की प्रत्यक्ष या परोक्ष सरकार है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि आयोग सरकारी नियंत्रण से मुक्त नहीं है। संप्रग शासित राज्यों में महिलाओं को लेकर किए जाने वाले उत्पीड़न की दर गैर कांग्रेसी राज्यों के मुक़ाबले कम नहीं रही है । अब जबकि बजट सत्र के कारण लखनऊ की राजनीति गर्म है, लगभग एक महीने बाद दिल्ली में गिरिजा व्यास और महिला आयोग को बांदा के शीलू की फिक्र होती है। क्या महिला आयोग की मौजूदा कवायद राजनीति से अभिप्रेरित नहीं ! सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर महिला आयोग की प्रासंगिकता क्या है?
यह देखने में आया है कि एक लंबे समय से, राष्ट्रीय महिला आयोग का राजनीतिक इस्तेमाल होता आया है। राजग के काल में गुजरात मामलों पर महिला आयोग की भूमिका संदिग्ध थी। महिला आयोग पहले यह मानने को तैयार ही नहीं थी की बलवाइयों ने बलात्कार की घटनाओं को अंजाम दिया है। सामाजिक संगठनों के दबाव से ही कुछेक मामले पंजीकृत हुए। गुजरात दंगे के दौरान महिलाओं से हुए बलात्कार पर स्वतंत्र जांच कमेटी का नेतृत्व करने वाले कमल मित्र चिनाय की रिपोर्ट और महिला आयोग की रिपोर्ट में जबरदस्त अंतर व्याप्त है। तीस्ता शीतलवाड़ या अन्य गैर सरकारी रिपोर्टे, सरकारी रिपोर्टों से भिन्न पाई गई। बलात्कार के दोषी बड़े कारकुनों को बचाने की आयोग ने भरसक कोशिश की थी। जाहिराशेख जैसे मामलों में आयोग की नौटंकिया अलग से शोध का विषय हैं। इशरतजहा के मामले पर महिला आयोग ने चुप्पी धारण कर ली। कश्मीर में आयोग की क्या भूमिका है यह शायद ही किसी को पता हो। आयोगों की कथा-महत्ता वाले ढेरो उदाहरण मिल जाएंगे। मतलब बिलकुल साफ है कि सत्ताधारी दल अपने फायदे की राजनीति के लिए आयोगों का बेजा इस्तेमाल करता है। शायद इसीलिए ही पार्टियां, आयोग के उच्च पदों पर अपने लोगों को बैठाती हैं।
अगर वाकई महिला आयोग स्त्रियॉं की सिविल अधिकारों को लेकर आग्रही है तो उसे शीलू जैसे मामलों पर राजनीति करने से बाज आना चाहिए। यह बिलकुल सही है कि उत्तर प्रदेश में महिला उत्पीड़न या अन्य आपराधिक मामलों में विधायकों और मंत्रियों के द्वारा या अपराध किया गया या अपराध को सरक्षण दिया गया। दरअसल यह तंत्र के विधिक दिवालिएपन का परिणाम है। न सिर्फ महिला आयोग बल्कि ढेर सारे सरकारी आयोगों को लोगो में ‘काहिरामय’ गुस्सा होने से पहले दोषियों को सजा देने एवं न्याय पर सबके अधिकार की व्यवस्था करनी चाहिए।
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