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Wednesday, 15 June 2011

ज्योतिर्मय डे की हत्या से उठे सवाल

अनुज शुक्ला –
पाकिस्तान में पत्रकारों पर हो रहे हमले के आलोक में भारत के कई मंचों पर अखबारों और पत्रकारों पर हिंसात्मक कार्रवाइयों के बढ़ते स्तर को लेकर बहस चल ही रही थी कि मुंबई में एक पत्रकार; पेशागत ईमानदारी के चलते अपराधियों की भेंट चढ़ गया। खोजी पत्रकारिता के जरिए कई आपराधिक एवं भ्रष्टाचार से जुड़ी कारगुजारियों की पोल खोलने वाले, मिड डे के वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे को माफियाओं ने दिन दहाड़े गोलियों से भून डाला। ज्योतिर्मय डे के साथ हुआ यह हादसा महाराष्ट्र में मजबूत हो चुके माफियातन्त्र का एक नया नमूना है, जिसने अवचेतन में चले गए पुराने सवालों को फिर से जिंदा कर दिया है।
डेढ़ साल पहले पुणे में भूमि घोटाले को उजागर करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता सतीस शेट्टी की हत्या और पाँच महीने पूर्व नासिक के ईमानदार सहायक कलेक्टर यशवंत सोनावड़े को तेल माफियाओं द्वारा जिंदा जलाने की घटना, महाराष्ट्र के माफिया तंत्र और प्रशासन के गठजोड़ का एक पुख्ता सबूत है। पाँच महीने के अंदर पुलिस और सीबीआई सोनावड़े के हत्यारों के खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल नहीं कर पाई। सतीस शेट्टी के केस की भी प्रगति बहुत ठीक नहीं है, जांच ठीक ढंग से नहीं किए जाने के कारण रसूखदार अपराधी कानूनी दायरे से बाहर हैं। जाहिर है कि इन घटनाओं से जहां माफियाओं की उदण्डता उजागर होती है तो वहीं महाराष्ट्र के सरकारी तंत्र की कलई भी खुलती है। ज्योतिर्मय डे की हत्या में यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि इसके भी तार आपराधिक सरगनाओं या तेल माफियाओं से जुड़े हुए हैं। सनद रहे कि ‘मिड डे’ में प्रकाशित ज्योतिर्मय डे की रिपोर्टों के आधार पर कई अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई है।
दरअसल अन्य राज्यों के मुक़ाबले महाराष्ट्र में आए दिन पत्रकार, आरटीआई कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता अपराधियों, माफियाओं और पुलिसतंत्र के हमलों के शिकार होते आए हैं। ज्योतिर्मय डे की हत्या से लगभग सालभर पहले सरकार की पोलखोलने वाले पत्रकार हेमंत पांडे को नागपूर में पुलिसतंत्र ने नक्सली बताकर फर्जी एनकाउंटर में मार दिया था। जिसपर अदालत में मामला विचाराधीन है। मुंबई के एक दूसरे पत्रकार सुधीर धवले को नक्सली होने के आरोप में छ महीने पहले से वर्धा स्टेशन से उठाया गया था, वो अभी तक जेल में बंद हैं। एक लंबे समय से कई अखबार और पत्रकार शिवसेना जैसी सांप्रदायिक ताकतों का गुस्सा झेलते आ रहें हैं। जाहिर है कि महाराष्ट्र के मौजूदा हालात पत्रकारों के अनुकूल नहीं कहे जा सकते हैं। महाराष्ट्र राज्य में प्रचुर मात्रा में भ्रष्टाचार और अपराध के मामले उजागर होते रहते हैं। इनपर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर खतरे की संभावना हमेशा बनी रहती है।
ध्यान दे तो ये सारी घटनाएँ सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार को उजागर करने या सच्चाई के साथ खड़े होने के कारण घटित हुई हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अपराध के इन खेलों में सफेदपोश लोगों का प्रश्रय न हो। हर बार बड़ी मुर्गियों तक कानूनी हाथ पहुँचते-पहुँचतेरूक जाता है। यशवंत सोनावड़े की हत्या के वक्त ही, महाराष्ट्र के कुछ संगठनों ने तेल और जमीन के गोरखधंधे में बड़े कारकुनों की संलिप्तता को लेकर मांग की थी कि पूरे मामले की बड़े स्तर पर जांच की जाय ताकि दागदारों का चेहरा उजागर हो सके। जांच की प्रक्रिया और उसकी गति क्या रही इसे सोनावड़े के केस में सीबीआई द्वारा चार्जशीट तक नहीं दायर करने से समझा जा सकता है। अब डे की हत्या के बाद महाराष्ट्र के गृह मंत्री आर.आर. पाटील की रिरियाहाट को कैसे सत्य मान लिया जाय कि अपराधियों को बख्शा नहीं जायेगा?
महाराष्ट्र में सांगठानिक अपराधों को राज्य की मशीनरी ने गुप्त रूप से प्रश्रय दे रखा है। यानी बड़े पैमाने पर अपराधियों को सफेदपोश चेहरों का वरदहस्त प्राप्त है। यह एक बार नहीं कई मर्तबा साबित हो चुका है। जाहिर है कभी कोई ऐसा उदाहरण ही नहीं देखने को मिला जिसमें अपराधियों को सजा मिली हो। कई मामले में अपराधी चार्जशीट के अभाव में बरी हो जाते हैं। फलस्वरूप अपराधी दिनदहाड़े आपराधिक कृत्यों को अंजाम देते हुए हिचकिचाते नहीं। पब्लिक है कि घटना के वक्त गुस्से और सदमे में रहती है लेकिन एक समय के बाद उसकी स्मृति से ये मामले गायब हो जाते हैं।
ज्योतिर्मय डे के की हत्या पत्रकारिता के ऊपर हमला नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार की फैक्ट्री बन चुके महाराष्ट्र के पूरे सिस्टम पर एक बड़ा सवाल है। क्या पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, आरटीआई कार्यकर्ता अपने काम की कीमत अपनी जान से चुकाएंगे, उनके ऊपर हमले किए जाएंगे? क्या सरकार दो मीनट की ‘भर्त्सना-बाइट’ से मुक्त हो जाएगी। डे की हत्या भविष्य में मुक्त पत्रकारिता को लेकर आशंकित करती है। यदि मामले की तह में जाकर अपराधियों को पकड़ कर सजा नहीं दी गई तो भविष्य मेँ अन्य दूसरे पत्रकारों पर जानलेवा हमलों की घटनाओं में इजाफा होगा।
anuj4media@gmail.com

Thursday, 9 June 2011

उमाभारती की वापसी के मायने



अनुज शुक्ला -
छः सालों से भाजपा में वापसी को लेकर चल रही अटकलों पर उस समय विराम लग गया जब दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उमा भारती का स्वागत करते हुए पार्टी में पुनर्वापसी की आधिकारिक घोषणा की। उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन तलाश रही भाजपा ने चुनाव के ठीक एक साल पहले उमा की वापसी और प्रदेश की बागडोर सौपे जाने की कवायद भविष्य की कई राजनीतिक संभावनाओं का संकेत मात्र है। इसे उत्तर प्रदेश में भाजपा की भगवा ब्रांड की आक्रामक राजनीति की पुनरावृत्ति भी मानी जा सकती है। जाहिर है उमा भारती उग्र छवि की नेत्री मानी जाती हैं। जो 90 के दशक के राम मंदिर आंदोलन की अगुवा की भूमिका में रह चुकी हैं।
पिछले सात सालों में कांग्रेस की नर्म हिन्दुत्व की राजनीति एवं बसपा की सोशल इंजीनियरिंग की गणित, भाजपा के जनाधार को मटियामेट कर चुकी है। उमाभारती उत्तर प्रदेश में उस समय वापसी कर रहीं हैं जब प्रदेश में भाजपा के औचित्य पर ही सवाल उठने लगे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो पार्टी, जनाधार और नेतृत्व, दोनों तरह के संकट से गुजर रही है। प्रश्न होना भी चाहिए कि आखिर उमाभारती की वापसी के मायने क्या हैं? आखिर किन शर्तों पर उमा की पार्टी में वापसी पर, लगातार विरोध कर रहे अगड़ी जाति के नेता राजी हुए हैं?
दरअसल यह संघ प्रमुख भागवत के दबाव के कारण संभव हो पाया है। दूसरी ओर नितिन गडकरी की सहमति, उमा की वापसी के माध्यम से पार्टी के विरोधी गुट को दिया गया एक संदेश भी माना जा सकता है। इसके पीछे अन्य दूसरे राजनीतिक-कूटनीतिक कारण हैं। प्रदेश में भाजपा के कद्दावर नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई में भाजपा लगातार पीछे होती गई। कभी उत्तर प्रदेश में मिलें सीटों के सहारे दिल्ली में बड़े दल होने के फायदा भाजपा को मिलता रहा है। अब जबकि उसके मूल प्रदेश में ही सीटों की संख्या में कमी आती गई सो भाजपा के सहयोगियों में भविष्य के राजनीति की ढेरों आशंकाएँ स्वाभाविक रूप से पैदा होती गईं । जाहिर है अगर प्रदेश में भाजपा की मौजूदा स्थिति नहीं सुधरती है तो उसके पास मध्य प्रदेश और गुजरात ही ऐसे दो राज्य बचते हैं जहां से ठीक-ठाक संख्या में पार्टी सीट पाने की गुंजाइश रख सकती है। शेष राज्यों में भाजपा की सीटों का विशेष मतलब ही नहीं रह जाता है। उदाहरण के लिए अगर दिल्ली, छत्तीसगढ़, हिमांचल और उत्तरांचल से मिलने वाली सीटों का आंकड़ा निकाला जाएगा तो पार्टी, तत्काल बहुत फायदे में नजर नहीं आ रही है। दूसरी ओर कम सीटों के कारण गठबंधन पर असर पड़ने की संभावना दिन ब दिन बलवती होती जा रही है।
महाराष्ट्र में शिवसेना के तेवर देख कर ऐसा नहीं लगता कि वह 2014 के चुनाव को भाजपा के साथ लड़ेगी। बिहार में नितीश उस स्थिति में पहुँच गए हैं कि सीटों के बटवारे पर अपनी मर्जी से निर्णय लेने को भाजपा को मजबूर कर सकते हैं अन्यथा कॉंग्रेस नितीश को अपने पाले में खीचने की लगातार कोशिश कर ही रही है। यानी खुद भाजपा के वजूद के लिए यह जरूरी हो गया है कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से वह अपनी राजनीतिक साख को बचाने का विकल्प तलाशे।
जहां तक उमा भारती की वापसी का प्रश्न है, यह साफ है कि उनकी वापसी एक खास रणनीति के तहत हुई है। उमा भारती को बहुत ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। दरअसल उमा भारती की वापसी पर इस बार असंतुष्टों का चुप रहना भाजपा के गंभीर रहस्यमयी राजनीति की ओर इशारा कर रही है। भाजपा को यह पता है कि प्रदेश में वापसी कर पाना लगभग नामुमकीन है, उमा के माध्यम से वह ‘चित भी मेरी और पट भी मेरी’ की गणित के तहत काम कर रही है। अगर उमा की महिला, पिछड़ा-दलित समर्थक, फायर ब्रांड हिन्दुत्व की छवि काम कर जाती है तो पार्टी को फायदा मिलेगा ही। अन्यथा हारने पर खुद ब खुद उनकी भूमिका शून्य हो जायेगी। एक तरीके से स्वतः राजनीतिक हत्या हो जायेगी। बहरहाल, कुछ भी हो लेकिन एक बात तय है कि अपनी खास छवि के लिए पहचानी जाने वाली उमा भारती के भाजपा का नेतृत्व संभालने से प्रदेश की राजनीति में संप्रदायीकरण को खूब हवा मिलेगी। पुनर्वापसी के वक्त प्रेस कोंफ्रेस में उन्होंने इशारों में इसे व्यक्त भी किया। उमा के ही शब्दों में ’प्रदेश को रामराज्य में ले जाने की इच्छा है, उत्तर प्रदेश राम और रोटी का राज्य है’ यानी उमा भारती पुनः धर्म से जुड़े भावनात्मक मुद्दों को हवा देंगी। गौरतलब है कि भाजपा से दूर रहते हुए भी उन्होंने राममंदिर की तर्ज पर हरिद्वार से गंगा मुक्ति जैसे धार्मिक आंदोलनों का नेतृत्व किया है। एक अंतराल पर संघ के स्वभाव के विपरीत, साध्वी दलित और पिछड़ी राजनीति भी करती आई हैं। अतीत में आरक्षण के मुद्दे पर उनके बयान विवादास्पद रहे हैं। प्रेस कोन्फ्रेंस में उन्होंने ‘उत्तर प्रदेश को मण्डल और कमंडल का राज्य’ कहकर दलित और पिछड़े मतों को पुचकारने का प्रयास भी किया।
जाहिर है कि उमा के इस बयान से भविष्य की योजनाओं का खुलासा होता है। यानी हिन्दुत्व की सांप्रदायिक राजनीति के अलावा दलितों और पिछड़ों के भाजपाईकरण का भी प्रयास होगा। अपनी इसी राजनीति के सहारे उमा भारती ने मध्यप्रदेश में कांग्रेस को जोरदार तरीके से हराया था। प्रदेश के सभी दल यह मान कर चल रहे हैं कि सबका मुक़ाबला मायावती से ही होना है, लिहाजा भाजपा के लिए उमा का महिला होना, उग्र हिन्दुत्व की छवि, पिछड़ी जाति से आना; कई ऐसे मूलभूत गुण है जिनके कारण पार्टी पुनः उमा-राग गाने को विवश हुई है। देखना यह है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में अपने मंसूबों को लेकर कितना सफल होती है।


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Tuesday, 7 June 2011

आतंक, म्लाडीच और मीडिया

अनुज शुक्ला-

मीडिया के लिए आतंक से जुड़ी खबरें हमेशा ही फायदेमंद साबित होती रही हैं। दो दशकों में मीडिया ने आतंक को लेकर ऐसा आभासी संसार गढ़ दिया है जिसमें टीवी के लिए आतंक से जुड़ी हुई खबरें टीआरपी के लिए बेहतर सौदा साबित होती आईं हैं। अगर साल भर की खबरों का एक औसत निकाला जाय तो शायद आतंक से जुड़ी खबरों पर मीडिया ने अपना सबसे ज्यादा वक्त जाया किया है। 2000 के बाद लगभग सभी ‘एक्सक्लूसिव’ या बड़ी ब्रेकिंग खबरे आतंक से जुड़ी रही हैं। ताजा उदाहरण में साल 2011 की सबसे बड़ी ब्रेकिंग खबर ओसामा के ऊपर अमेरिका का निर्णायक ऑपरेशन रहा। लेकिन अजीब इत्तेफाक है कि ये खबरें तथाकथित ‘इस्लामिक आतंकवाद’ के चेहरे को ही उजागर करती नजर आईं है। यानी पिछले एक दशक की मीडिया रिपोर्टिंग ने आतंकवाद को, इस्लाम के अनिवार्य घटक साबित करने का दुष्चक्र रचता आया।
जबकि इस्लामिक आतंकवाद से ‘फोबियाग्रस्त’ मीडिया के लिए जनरल ‘रात्को म्लाडीच’ जैसों का क्रूरतम अपराध कोई मायने नहीं रखता। भले ही म्लाडीच के ऊपर इतिहास की जघन्यतम हत्याओं में से एक का अभियोग लगा हो। जाहिर है संवेदनशील मुद्दों पर मीडिया की खबरों के पीछे लगी यहूदी उद्यमियों की पूंजी, जनित ‘नस्ली वर्चस्व’ के सिद्धान्त को कायम करती है। अब अपनी साख के लिए संघर्षरत मीडिया से यह अपेक्षा करना कि ’यह अपनी वस्तुनिष्ठता एवं तथ्यात्मकता को बरकरार रखेगी ; महज एक कोरी कल्पना है। क्योंकि मीडिया की सोच या वैचारिकी की निर्मिति का बहुतायत स्त्रोत इस्राइल केन्द्रित, पश्चिमी दृष्टिकोण बना हुआ है। हालांकि समय-समय पर ये खुद को ज्यादा लोकतान्त्रिक और सहिष्णु जतलाते आएं हैं। जिसे पिछले दिनों ट्यूनीशिया, मिश्र एवं लीबिया में हालात के मुताबिक तब्दील हुई इनकी रणनीतियों से समझा जा सकता है।
आतंकवाद को लेकर पश्चिमी जगत ने मीडिया के सहारे एक रहस्यमयी ‘फेनोमेना’ की रचना की है। दरअसल जिस एक हादसे के बाद इस्लामिक आतंकवाद का हौवा, अमेरिकी प्रशासन की निगाह में खटका, उसके मूल में वर्ल्ड ट्रेड पर हमले और उसमें मारे गए अमेरिकियों की मौत का प्रतिशोध था। बहरहाल, कौम चाहे जो भी हो; बर्बरता या आतंक को बचाने को लेकर कोई तर्क नहीं गढ़ा जा सकता। वह चाहे ओसामा हो या ‘जनरल म्लाडीच’। ‘म्लाडीच’ जिसके सिर पर ओसामा से ज्यादा हत्याओं का जघन्य अपराध है। जिसे सूचनाओं के प्रति एकपक्षीय नजरिए के कारण दुनिया के अन्य देश ठीक तरह से परिचित नहीं हो पाए। काबिलेगौर है कि आतंकवाद के खिलाफ अपनी चौधराहट, मानवाधिकारों की रक्षा के संकल्प को दोहराने वाले पश्चिमी जगत का रवैया, क्या हर मामले में न्यायपूर्ण रहता है? वह किस तरीके सूचना-साधनों का इस्तेमाल अपने एजेंडे को स्थापित करने के लिए करता है तर्कसंगत है?
पश्चिमी जगत के लिए आतंक के मुद्दे और परिभाषाएँ क्षेत्रवार कैसे अलग हो जाती हैं इसे मीडिया की उन खबरों से भालिभांति समझा जा सकता है जो इतिहास के क्रूरतम हत्यारे म्लाडीच की गिरफ्तारी के बाद नजर आईं हैं। म्लाडीच ने 1995 में बोस्निया युद्ध के दौरान, ‘स्रेबरेनिका’ के शरणार्थी शिविर में पनाह लिए 7500 बेगुनाह मुसलमानों का कत्लेआम किया, ताकि इस समुदाय से 15 वी शताब्दियों में हुए अत्याचारों का प्रतिशोध ले सके। क्या ‘बेलग्रेड’ में जो भीड़ म्लाडीच को हीरो के तौर पर पेश करती नजर आ रही है, उसे रिहा करवाने के लिए हिंसक झड़पे की जा रही है, वह कैसे कट्टरपंथियों से अलग नहीं है? काबिलेगौर है कि म्लाडीच से जुड़ी वही खबरें मीडिया परोस रही हैं, जो म्लाडीच के पक्ष में हैं। उन्हीं खबरों की फुटेज दिखाई जा रही है जो उसे बचाने से संबंधित हैं। मीडिया, म्लाडीच की बर्बरता के न तो फुटेज दिखा रही है (जैसाकि तालिबान या अलकायदा से जुड़े मामलों में करती आई है) और न ही उस बर्बर समय की कहानी ही नजर आती है। अलबत्ता ओसामा कितना बर्बर था, कितने आतंकी कारनामे किया, आगे के सालों में अलकायदा की क्या रननीतियाँ होंगी; इससे दुनिया का बच्चा –बच्चा परिचित हो चुका है।
सूचना के लिए पश्चिम पर आश्रित मीडिया उसी ‘वायस्ड’ छवि को परोसती है, जो वह आयात करती है। इससे बड़ा अफसोस और क्या हो सकता है कि अधिकांश मीडिया संस्थान परोक्ष या अपरोक्ष रूप से पश्चिमी पूंजी के पंजे में हैं। जैसे भारत में पूंजी एवं पश्चिमी विचार के रूप प्रत्यक्ष प्रवेश है, जहां बार्ंबार खबरों की प्रस्तुति पर इसका दूरगामी असर दिखता है। सरोकार, प्रतिबद्धता एवं भारतीयता की दुहाई देने वाला देशी मीडिया क्या संवेदनशील खबरों की रिपोर्टिंग को लेकर फिक्रमंद है? अलबत्ता वह दुर्लभ जीवों को बचाने के अभियान, टीवी सिनेमा के प्रमोशन एवं प्रायोजित रेसों के आयोजन को लेकर ज्यादा सक्रिय दिखती है। प्रिंट मीडिया जंगल को तो बचाने का मुहिम चलाती है लेकिन अनुचित तरीके से सबसिडी में मिले कागजों का इस्तेमाल खबरों के साथ घपलेबाज़ी के रूप में करती है। दुख इस बात का है कि धर्म विशेष के आतंक की जुड़ी खबरों की मसालेदार प्रस्तुति करने वाली मीडिया जनरल ‘म्लाडीच’ पर कैसे चूक गई?

Friday, 27 May 2011

किसे वकील करें, किससे मुंसिफ़ी चाहें

अनुज शुक्ला -
बने हैं अहले हवस, मुद्दई भी मुंसिफ़ भी / किसे वकील करें किससे मुंसिफ़ी चाहे,
गाजियाबाद के भट्ठा परसौल में लगी आग बढ़ती ही जा रही है। इससे जुड़ी रोज निकल रही सूचनाएं राजनीति के पारे को बढ़ाने वाली साबित हो रही हैं। वैसे भट्ठा परसौल की घटना के वक्त यह आशंका व्यक्त की गई थी कि ग्रेटरनोएडा की यह जगह देश में दूसरा नंदीग्राम और सिंगूर साबित होगी। कारण भी साफ है। 2012 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए मायावती सरकार में अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के असंतोष को देखते हुए प्रदेश के विपक्षी दल इस सुनहरे मौके को चूकना नहीं चाहते। हालांकि लड़ाई की मूल जड़ विकास बनाम विस्थापन के पुराने जुमले से जुड़ी हुई है लेकिन जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं उनका विस्थापन से कुछ लेना-देना नहीं है बल्कि इसमें उनकी भविष्य के राजनीति की जय-पराजय लगी हुई है।
पिछले चार सालों के माया राज में भट्ठा परसौल, कोई नई जगह नहीं है जहां के किसान सरकार के लोकतान्त्रिक (पुलिसिया) दमन का शिकार हुए हैं, गोरखपुर से लेकर गाजियाबाद तक माया-राज में लगभग हर महीने सरकार का किसानों के प्रति दमनात्मक रवैया साबित होता आया है। भट्ठा-परसौल की घटना से पाँच महीने पहले इलाहाबाद के करछना एवं शंकरगढ़ में भी साल भर से पावरप्लांट के लिए अधिग्रहित की जा रही ज़मीनों के खिलाफ किसानों के सब्र का बांध टूट पड़ा था। करछना में पुलिस की फायरिंग और पिटाई के कारण एक किसान की मौत हो गई थी और दर्जनों किसान घायल हुए थे। कई किसान नेताओं के ऊपर फर्जी मुक़दमे दर्ज किए गए। गंगा एक्सप्रेसवे को लेकर पूर्वाञ्चल के कई हिस्सों में किसान आंदोलनकारी आंदोलनरत हैं उनकी सुध लेने वाला कोई राहुल गांधी और भाजपा नहीं है। जाहिर है वहां वह मसाला ही नहीं है जो आमतौर पर संसदीय राजनीति के लिए जरूरी है।
भट्ठा-परसौल में सवाल, मूल मसलों से हट कर हद दर्जे की राजनीति तक पहुँच चुके हैं। इसी सिलसिले में राहुल गांधी ने भट्ठा-परसौल के किसानों के प्रतिनिधि मण्डल को लेकर प्रधानमंत्री से मुलाक़ात की और पूरे हालात से प्रधानमंत्री को अवगत करवाया। उनके द्वारा दिया गया बयान कि एक्सप्रेसवे कई किसानों की लाशों पर बनवाया जा रहा है। जबकि सवालों के जवाब देने की बजाय इसे दूसरी दिशा में धकेलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। भट्ठा-परसौल पर राहुल गांधी, कांग्रेस और भाजपा की दिलचस्पी काबिलेगौर है सपा और रालोद पर तो बात करनी ही बेमानी होगी। राहुल और कांग्रेस जिनके घड़ियाली आसूं थमने का नाम नहीं ले रहे हैं उनसे यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या कांग्रेस का रवैया कांग्रेस शासित राज्यों में संदेह से परे है, अरुणाञ्चल प्रदेश की बिजली की हाइड्रो परियोजना एवं महाराष्ट्र के जैतापुरा की परमाणु परियोजना, जिसके कारण बड़े पैमाने पर लोग प्रभावित हुए हैं ; अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलनरत लोगों के प्रति यहां की सरकारें क्यों दमानात्मक है क्या यहां राहुल का हस्तक्षेप करना सकारात्मक कदम नहीं होता? या फिर यहां के लोगों की पीड़ा ही दस-जनपद के दरबार तक पहुंचने में कामयाब नहीं हुई। महाराष्ट्र में जैतापुरा के अलावा भी एमआईडीसी के बैनर के नीचे समूचे राज्य में विकास के लिए जरूरी बताए जा रहे अधिग्रहण का नंगा नाच चल रहा है। यहां विकास रिसने का सिद्धान्त फेल हो चुका है। विदर्भ में किसानों के विस्थापन की कीमत पर जो छोटे-छोटे बांध बनाए गए हैं या बनाए जा रहे हैं उसमें रोके गए पानी का उपयोग न तो गांवों में पेयजल की समस्या के लिए किया जा रहा है और न ही खेतों की सिचाई के लिए ही पानी उपलब्ध है। बल्कि इसे शहरों में आपूर्तित किया जा रहा है। जाहिर है गांवों की दशा को सुधारने के नाम पर चलाए गए तमाम प्रयास सिर्फ गांवों को बतौर ‘आंतरिक उपनिवेश’ तैयार करने वाले साबित हो रहे हैं।
दूसरी ओर भट्ठा-परसौल में भाजपा का किसान प्रेम जो पुनः जागृत हुआ है, उससे भी यह पूछना चाहिए कि क्या वह नैतिक रूप से इसके लिए हकदार है ? मौजूदा दौर में हो रहे अधिग्रहणों के लिए जितना उदारवाद ज़िम्मेवार है, मनमोहन सिंह की नीतियां ज़िम्मेवार हैं उतनी ही जिम्मेवारी इसे गति प्रदान करने वाली वाजपेई के नेतृत्व वाले भाजपा सरकार की भी थी। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे भाजपा शासित राज्यों में अधिग्रहण और किसानों की आत्महत्याओं ने एक बार फिर से भाजपा की कलई खोल दी है। अकेले छतीसगढ़ में 2009 के साल में 1811 किसानों ने आत्महत्या की थी। भाजपा के शासन में अधिग्रहण की दास्तान, दमन और निरंकुशता से तो पूरी दुनिया भली-भांति वाकिफ हो ही चुकी है। जाहिर है अधिग्रहण के सवाल पर दोनों दलों की ‘टेक्टिस’ जनविरोधी ही रही है। यानी इन दलों ने हमेशा ही खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों को निगमों के दबाववश नजरअंदाज ही किया है। फिर कैसे यह मान लिया जाय कि ग्रेटर नोएडा के भट्ठा-परसौल को लेकर राहुल गांधी और भाजपा ईमानदार हैं और राजनीति नहीं कर रहीं हैं, बावजूद इसके कि किसानों की हत्याओं के लिए मायावती को कभी माफ नहीं किया जा सकता? अगर वाकई कांग्रेस और भाजपा किसानों के लिए कुछ करना चाहती हैं तो इस काले कानून की समीक्षा करें और संशोधन करके इसमें किसानों के व्यापक हितों की गुंजाइश पैदा करें।
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Saturday, 21 May 2011

महेंद्र सिंह टिकैत


अनुज शुक्ला –
यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि मौजूदा संसदीय राजनीति में जनहित से जुड़े मुद्दों का पतन हो चुका है। खासकर खेती और किसानी से जुड़े सवालों की रहनुमाई करने वाले अब कम ही बचे हैं। उत्तर प्रदेश के साथ देश के दूसरे हिस्सों की स्थिति लगभग यही है। अधिग्रहणों वाले दौर में, देश एक अदद किसान नेता और ताकतवर किसान संगठन की आस लगाए बैठा है जो उसके संघर्ष को उड़ान दे सके। ठीक इसी समय दमदार किसान हिमायती, ठस देशी पृष्ठभूमि वाले किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु किसानों एवं उनके आंदोलनों के लिए किसी सदमे से कम नहीं। टिकैत ने रविवार 15 मई की सुबह दुनिया को अलविदा कह दिया।
महेंद्र सिंह टिकैत ग्रामीण जीवन में रचे-बसे ऐसे इंसान थे जो पांच दशक की लंबी किसान राजनीति में सक्रिय भागीदारी के बावजूद कभी खुद को सत्ता का मोहताज नहीं बनने दिया। बनिस्पत इसके कि आजकल एक-दो आंदोलनों के सहारे लोग सत्ता की मलाई के चक्कर में लग जाते हैं। टिकैत का जन्म 6 अक्टूबर 1935 को पश्चिमी उत्तरप्रदेश के जिले मुजफ्फरनगर के सिसौली गाँव में एक जाट परिवार, चौधरी चौहल सिंह के घर में हुआ था। बचपन में ही पिता की असमय मृत्यु हो गई और परंपरागत मूल्यों के कारण सात साल की उम्र में टिकैत, प्रसिद्ध बालियान खाप पंचायत के मुखिया बने। टिकैत को अपने जातीय समाज के नेतृत्व करने का मौका पारिवारिक कारणों से मिला। लेकिन आज जिन वजहों से टिकैत को दुनिया जानती है वह खुद इस व्यक्ति के अपने संघर्षों की बदौलत है।
किसान पृष्ठभूमि से जुड़ा होने के बावजूद राजनीति के किसानों के प्रति रवैये से यह व्यक्ति पहले परिचित नहीं था। 1986 में भारतीय किसान यूनियन की स्थापना करते वक्त टिकैत को यह नहीं पता होगा कि जिस संगठन की वह स्थापना करने जा रहे हैं वह आने वाले दशकों में किसानों के हक की आवाज को बुलंद करेगा और किसान आंदोलनों का प्रतीक बन जाएगा। भाकियू की स्थापना के एक साल बाद 27 जनवरी 1987 को करमूखेड़ी बिजलीघर पर बड़ा किसान आंदोलन हुआ, यह टिकैत के नेतृत्व में किया गया पहला आंदोलन था जो बढ़े हुए बिजली की सरकारी दरों से संबन्धित थी। टिकैत के संघर्षपूर्ण रवैये ने सरकार को झुकने पर विवश किया, हालांकि इस संघर्ष में, आंदोलन के दो किसान साथियों की जान गई लेकिन जब आंदोलन खतम हुई तो खेती के काम के संसाधनों की बढ़ती दरें और सरकार द्वारा फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा के नारे पर लाखों किसानों का हुजूम टिकैत के पीछे खड़ा हो चुका था। टिकैत ने बहुत ही कम समय में प्रदेश भर के किसानों को एकजुट करने का काम किया। आज उत्तरप्रदेश के विभिन्न हिस्सों मसलन ग्रेटर नोएडा में पुलिस के नृशंस दमन के बावजूद भट्ठा-परसौल में निडर होकर किसान रोज पंचायते लगा रहे हैं या पश्चिम में जितने भी आंदोलन खड़े हुए उनके पीछे टिकैत द्वारा चलाए गए आंदोलनों का ही विश्वास काम कर रहा है। 87 में करमूखेड़ी के बाद मेरठ में कमिश्नरी आंदोलन, मुरादाबाद में रजबपुर आंदोलन, दिल्ली के वोटक्लब पर किया गया आंदोलन, 1989 में अलीगढ़ में किया गया आंदोलन तथा इसी साल नईमा के अपहरण को लेकर किया गया आंदोलन, उत्तरप्रदेश के किसान आंदोलनों में मील के पत्थर के रूप में गिना जाता है। हालांकि आंदोलनों के प्राथमिक चरण में स्पष्टतः महसूस किया जा सकता है कि इनके आंदोलन के मुद्दे बड़े सहज रहे हैं। टिकैत का मानना था कि सत्ता-संचालक किसानों की समस्याओं को समझे और उसके समाधान के लिए ठोस पहल करे। लेकिन 90 के बाद में टिकैत का आंदोलन ज्यादा परिपक्व कहा जा सकता है। यह दौर किसानों के सामने नए संकट के दौर को लेकर आया। खेती में पूँजीपतियों की गिद्ध-दृष्टि को टिकैत ने पहचान लिया। देश-विदेश के दूसरे किसान नेताओं के साथ टिकैत ने दुनिया भर के मंचों से डंकल प्रस्ताव, गैट और वैश्वीकरण का विरोध किया। इस दौरान जर्मनी, वेल्जियम और फ्रांस जैसे कई पश्चिमी देशों में विरोध प्रदर्शनों और पैदल मार्चों में हिस्सा लिया। विरोध प्रदर्शन के दौरान जर्मनी में गिरफ्तारी भी हुई। टिकैत के साथ काम कर चुके किसान नेताओं का मानना है कि ‘एक दर्जन से ज्यादा की जेल यात्राएं और चार दशक के लंबे किसान संघर्ष ने इस इंसान को किसान आंदोलनों का दूसरा पर्याय बना दिया’।
अच्छे-अच्छों को भी पटखनी देने वाले टिकैत के लिए संसदीय राजनीति का अनुभव कड़वा ही रहा। इस भोले-भाले गवई इंसान को राजनीतिक दलों ने हमेशा ही ठगी का शिकार बनाया। एक तरीके से जहां व्यक्तिगत रूप से टिकैत को इन घटनाक्रमों ने कमजोर किया तो लाखों किसानों के हुजूम का नेतृत्व करने वाले भाकियू की साख को भी बट्टा लगाया। 1989 में वीपी सिंह के लिए जनतादल के पक्ष में अपील की। स्वभाव से धार्मिक होने के कारण 1991 में ‘राम के नाम और आत्मा की आवाज’ का हवाला देते हुए अपरोक्ष रूप से भाजपा का समर्थन किया। टिकैत के समर्थन ने दोनों मर्तबा इन दलों को लाभ पहुंचाया लेकिन सत्ता के गलियारे में जाने के बाद इनका भी रवैया किसानों के प्रति पूर्व की सरकारों की भांति ही रही। कभी दलीय राजनीति के विरोध के नाम पर शेतकरी नेता शरद जोशी से अपने रास्ते अलग करने वाले टिकैत के लिए राजनीतिक दलों को समर्थन देने वाले ये निर्णय, भाकियू की साख में बट्टा लगाने वाले साबित हुए। राजनीति से मिले इन खट्टे अनुभवों के बावजूद 1996 में टिकैत एक बार फिर छोटे चौधरी के राजनीतिक धोखे का शिकार हुए। पुत्रों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने पुनश्च टिकैत को दलीय राजनीति की ओर रूख करने को विवश किया, परिणामतः 2004 में बीकेडी का गठन किया। टिकैत दलीय राजनीति को कभी ठीक तरीके से समझ नहीं पाये।
मौजूदा दौर में जब किसान आंदोलन के विकल्प तेजी से सिमट रहे हैं, किसानों को सरकार और निगम के दो स्तरों पर संघर्ष करना पड़ रहा है ऐसे हालात में किसानों का नेतृत्व करने वाला एवं कभी न हार मानने वाले नेता का जाना एक अपूरणीय क्षति है। तमाम विरोधाभासों के बावजूद आने वाला इतिहास महेंद्र सिंह टिकैत के संघर्ष की अनुगूंज को महसूस करेगा।
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Tuesday, 22 March 2011

मौत के सामने खड़े हैं उत्तर प्रदेश के बुनकर

अनुज शुक्ला-

मार्च के पहले हफ्ते में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में बुनकर लियाकत अली ने खुदकुशी कर ली। पिछले एक दशक में मुक्त व्यापार की अवधारणा और सरकारी योजनाओं से परेशान होकर बुनकरों ने बड़े पैमाने पर आत्महत्या की है। यह बात पुख्ता होती है कि देश भर में अधिकांश आत्महत्या करने वाले लोग श्रम के जरिए उत्पादन करने वाले परिवारों से संबन्धित हैं। वह चाहे कृषि से जुड़ा उत्पादन हो या श्रम से जुड़ा किसी अन्य प्रकार का उत्पादन। यानी नई व्यवस्था, श्रमिकों को लगातार अभावग्रस्त करते जा रही है। कृषि, असंगठित व्यापार के क्षेत्र में लगे मजदूरों की स्थिति बहुत दयनीय हो चुकी है। मौजूदा आर्थिक नीति के कारण उनके सामने विकल्प भी सिमटते जा रहे हैं।
गैर कृषि क्षेत्र से जुड़े श्रमिकों की आत्महत्या से जो बड़ा सवाल उभरता है वह यह कि क्या आत्महत्या करना ही इनकी नियति है? बावजूद इसके कि सरकार औद्योगिकीकरण को श्रमिकों की बेहतरी, रोजगार की उपलब्धता व चहुंमुखी विकास के लिए आवश्यक मानती है। उत्तर प्रदेश में पूर्वाञ्चल का क्षेत्र दुनिया में कढ़ाई - बुनाई से जुड़ी कसीदेकारी के काम के कारण प्रसिद्ध है। बनारस, भदोही, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर और मिर्जापुर के क्षेत्रों की एक बड़ी आबादी जो वर्गीय पदानुक्रम में सबसे नीचे है, दुर्भाग्य से भूमिहीन भी - कालीन, साड़ी और हथकरघा के उत्पादन से जुड़ी हुई हुई है। 2000 में कालीन उत्पादन और इससे जुड़ी समस्याओं की ओर देश के योजना नियंताओं का ध्यान गया। सरकार ने कालीन उत्पादन में आ रही समस्याओं के समायोजन हेतु कई कल्याणकारी योजनाओं को नियोजित किया। इसी क्रम में कालीन उत्पादन को पूर्ण उद्योग का दर्जा प्रदान किया गया। 2010 में बनारस और भदोही के बीचो-बीच एक हैंडीक्रेफ्ट सेज की रूपरेखा भी मूर्त हुई, हालांकि यह 2004-2005 में ही प्रस्तावित थी; उस समय किसानों द्वारा जमीन न दिए जाने के कारण बन नहीं पाई। 2000 से 2010 तक जितनी भी सुधार की पहले की गईं, उसका सतही फायदा इस कारोबार में लगे उद्यमियों, और नई मार्केट नीति से उपजे विचौलियों को तो प्राप्त हुआ लेकिन इसका कोई फायदा उत्पादन के काम में लगे श्रमिकों को नहीं मिला। कार्पेट को उद्योग का दर्जा देने से पहले यहाँ के कार्पेट श्रमिकों को अपने द्वारा तैयार हथकरघा माल का बेहतर मूल्य मिलता था। वे काम करने व विचौलियों से स्वतंत्र थे। लेकिन ओद्योगिक नियंत्रण होने के बाद सबकुछ उद्यमियों द्वारा तय किया जाने लगा। कभी मजदूर जो एक प्रकार से इस उद्योग में कांट्रेक्टर की हैसियत से काम करता था और अपने श्रम का मूल्य खुद तय करता था , नई नीति के कारण कंपनियों और दलालों के चंगुल में जा फंसा। यानी नई नीति से सीधे तौर पर उद्यमियों का तो लाभ बढ़ा है पर इस लाभांश में श्रमिकों की वाजिब हिस्सेदारी नहीं हुई है। उनके हिस्से भुखमरी, बेरोजगारी, कर्ज , आत्महत्या, और बड़े पैमाने पर रोटी के लिए अपनी जमीन से पलायन करना आया। 2001 के बाद से हथकरघा उद्योग में कच्चे माल की विदेशी आगत बढ़ी है। परिणामतः धागों के उत्पादन में 20 % की गिरावट दर्ज की गई है। धागों और सिल्कों को तैयार करने वाला, साड़ियों और कालीनों को तैयार करके बेचने वाला श्रमिक विचौलियों को अपना माल बेचने पर मजबूर हुआ। वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उसका टिकना कठिन हो गया। विकल्पों के अभाव और ‘अंतर्गत-उपनिवेशवाद’ के नतीजे ने इस काम में लगे हुए श्रमिकों को आत्महत्या के रास्ते पर धकेला। शोध बताता है कि बेहतरीन सिल्क की साड़ियों के लिए मशहूर, अकेले बनारस में ही आत्महत्या के पूरे मामलों में 30% आत्महत्याएँ बुनकरों से संबंधित होती है। अगर पूर्वाञ्चल के पूरे हिस्से को इसमें जोड़ा जाय तो कृषि क्षेत्र से जुड़ी आत्महत्याओं के बरअक्स एक दूसरी स्याह तस्वीर बनती दिखाई पड़ेगी। गैर सरकारी रिपोर्टों का हवाला है कि तकरीबन पचास हजार श्रमिक इन क्षेत्रों को छोड़कर गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और देश के अन्य हिस्सों में बुनकरी के काम के लिए पलायन कर रहे हैं । यह महज संयोग नहीं है कि इन क्षेत्रों में अधिकांश आत्महत्या के या फिर पलायन के मामले, किसी न किसी रूप में बुनकरों के परिवार से ही जुड़े होते हैं। अलबत्ता आत्महत्या को दर्ज करने की पुलिसिया तकनीक में इसपर दूसरा मुलम्मा चढ़ा दिया जाता है। यह मूल मुद्दों की शिनाख्त न करने देने एवं तस्वीर को और धुंधला करने का सरकारी कुचक्र है। भारत की तमाम राज्य सरकारें अभी इस भयावह सच्चाई को मानने के लिए तैयार नहीं दिखती कि बड़े पैमाने पर औद्योगिक मजदूर एवं असंगठित व्यापार के क्षेत्र से जुड़े खोमचे वाले, फेरीवाले भी आत्महत्या के रास्ते का चुनाव कर रहे हैं। उदारीकरण के दौर के बाद किसान आत्महत्याओं के साथ - साथ ही अन्य उत्पादनों से जुड़े मजदूरों ने व्यापक पैमाने पर आत्महत्या की है। क्या मजदूरों की आत्महत्या की बात को खारिज कर दिया जाएगा या फिर आत्महत्या के मामलों में वृद्धि को देखते हुए ठोस पहल की शुरूआत होगी, जिससे मजदूरों की भलाई हो सके?
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Friday, 18 March 2011

व्यवस्था से यवतमाल के प्रश्न



अनुज शुक्ला –

2011 के पहली तिमाही में ही किसानों की अति आत्महत्याओं ने यवतमाल को मीडिया की सुर्खियों में ला दिया है। राज्य के बजट सत्र से पहले मार्च के पहले सप्ताह में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने वहां का दौरा कर, पूर्व की भांति कई करोड़ के औद्योगिक योजनाओं की घोषणा की। मूल मसला है कि क्या अबकी समस्याओं का उपचार हो जाएगा?
भारत के मध्य में बसा हुआ यवतमाल महाराष्ट्र की ऐसी जगह है, जो बहुतायत किसान आत्महत्याओं का पर्याय बन चुका है। यवतमालियों का मानना है कि ब्रिटिश काल में स्थिति इतनी बदतर नहीं हुई थी जितनी 90 के बाद की नव पूंजीवादी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में हुई। समय के साथ तथाकथित विकास के पहिये ने इस क्षेत्र के भाग्य की दूसरी पटकथा लिखना मंजूर किया। यवतमाल की मुख्य पहचान उम्दा कोटि के कपास के कारण होती थी। कपास उत्पादन के अलावा यह अंग्रेजों के लिए पर्यटन स्थल के रूप में प्रतिष्ठित था। यवतमाल का भावार्थ भी ‘खूबसूरत पहाड़ों की कतार’ के रूप में होता है। अब यह किसान आत्महत्याओं के लिए कुख्यात है। हाल के दिनों में गैर सरकारी संगठनों के हवाले से खबर आई कि फरवरी 2011 तक यवतमाल के 58 किसानों ने आत्महत्या के रास्ते का चुनाव किया जो राज्य सरकार द्वारा ‘मान्य आत्महत्या की कोटि’ में आती हैं। हालांकि राज्य सरकार ने इन आंकड़ों की सच्चाई पर संदेह व्यक्त किया है। आमतौर पर किसान आत्महत्या के लिए अभ्यस्त हो चुके इस क्षेत्र में मौत की ऐसी घटनाएँ चौंकाने वाली नहीं होती। लेकिन परस्पर विरोधाभाषी प्रवृत्तियों का उभार काबिलेगौर है, जो लोकतान्त्रिक व्यवस्था में वृद्धि और विकास के नारे का चीरहरण करती नजर आती है।
असमान शिक्षा, अव्यवस्थित भूमि बंदोबस्त, सामाजिक पदानुक्रम में वर्गीय चेतना का तत्त्व, शिक्षा का उचित प्रचार -प्रसार, औद्योगिक विकास का न हो पाना समस्त विदर्भ क्षेत्र की आत्महत्याओं के कारकों में गिना जाता है। यह जानकर आश्चर्य होगा कि फ़ौरीतौर पर तमाम साधनों की उपलब्धता के बावजूद यवतमाल में दिनों-दिन आत्महत्या की घटनाओं में इजाफा हो रहा है। जैसे यहाँ की शिक्षा दर पुरूषों में 83% और महिलाओं में 72% के करीब है। जो 59.5 फीसदी की राष्ट्रीय शिक्षा दर से कहीं ज्यादा है। रोजगार-परक उच्च तकनीकी शिक्षा के लिए 35 छोटे-बड़े सरकारी और गैरसरकारी संस्थान यहां मौजूद हैं। सवाल उठता है कि इनमें आपदाग्रस्त परिवारों की कितनी हिस्सेदारी है? शिक्षा के निजीकरण और माफियाओं की गिद्ध दृष्टि ने उच्च शिक्षा संस्थानों में व्यावसायिक लाभ के कारण यवतमाली छात्रों की उपस्थिति कम की है। यवतमाल में एमआईडीसी की लोहरा, डिग्रास, पुसद, उमरखेड़, वणी, पांढरकवाड़ा जैसी सात परियोजनाएं औद्योगिक उत्पादन कर रहीं हैं, और लगभग आधे वर्ग किलोमीटर का रेमंड का काटन सेज भी मौजूद है, जो अपना 100% जींस फाइबर यहाँ उत्पादित करती है। इतना सब होने के बावजूद किसान आत्महत्याएँ बढ़ती ही जा रही हैं। जाहिर है तमाम सुधार प्रक्रियाओं में आपदाग्रस्त लोगों की भागीदारी नहीं के बराबर है।
दूसरी ओर ‘यवतमाल के विभिन्न हिस्सों में कंडोम की बिक्री में पांच गुना की रिकार्ड बढ़त’ वाली खबर नये सामाजिक परिवर्तन को इंगित करती है। यानी आपदाग्रस्त किसान, परिवार पालने के लिए सेक्स व्यवासाय की कीचड़ में धस रहे हैं। यवतमाल की आबादी का बड़ा हिस्सा, जो 34 % के आस-पास है- जनजातियों और अनुसूचित जातियों की है। जो औद्योगिक विकास से उपजी तमाम तरीके के उत्तर-औपनिवेशिक कचड़े को ढोने के लिए मजबूर है। एमआईडीसी की कहने को यहाँ सात परियोजनाएं हैं, हकीकत में गैर जरूरी औद्योगिक सुधार में जरूरतमंद तबका अभी तक भागीदार बनने में कामयाब नहीं हुआ। क्योंकि अधिकांशतया काम करने वाला श्रमिक और बाबू वर्ग या तो बाहरी हैं या शहरी वर्ग के। भूमि बंदोबस्त में असंतुलन के कारण अधिकांश आत्महत्या ग्रस्त परिवार छोटी जोत वाले किसान होते हैं, जो कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश के अभाव के कारण अधिक लागत, कर्ज और विकास के नाम पर सरकारी ठगी का शिकार बन अपनी ज़मीनों से हाथ धोने के कारण आत्महत्या के रास्ते का चुनाव करते हैं। अभी भी यवतमाल में बिजली, सिचाई, कृषि-यान्त्रिकी का उचित समायोजन नहीं किया जा सका है। बावजूद इसके असमान औद्योगिक विकास की को बढ़ावा दिया जा रहा है। जिसका फायदा यहाँ काम कर रही चंद कार्पोरेट्स कंपनियों और माइग्रेंट श्रमिकों को मिल रहा है। मूलभूत ढांचे में विकास के नजारे का अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरे यवतमाल में नैरो मीटर गेज पर चलने वाली एकमात्र ट्रेन, शकुंतला एक्सप्रेस को बंद कर दिया गया। परिवहन की मूलभूत व्यवस्था के साथ ठंडे बस्ते में दबी सार्वजनिक निवेश से जुड़ी कई परियोजनाएं, यक्ष प्रश्न हैं।
व्यवस्था से यवतमालियों और भी सवाल हैं, अंतरप्रान्तीय राज्यों से सटा होने के कारण मराठी और हिंदी जैसी सरकारी भाषाओं के दबाव से उन्हें मुक्त किया जाय। यानी गोंडी, गोरमती, बंजारी, कोलामी जैसी जनजातीय बोलियों के इर्द-गिर्द ही उनकी भूमिका रेखांकित की जाय। यह इस क्षेत्र के अलावे कई अन्य आदिवासी क्षेत्रो की बड़ी समस्या है। दूसरी ओर भूमि सुधार, कृषि यंत्र, बीज खाद, कीटनाशक जैसे आगतों पर से मुनाफाखोरों का नियंत्रण समाप्त हो। सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा दिया जाय व इस क्षेत्र के अनुकूल खेतीहर-औद्योगिकीकरण के वैकल्पिक ढांचे, सहकारी खेती पर बल दिया जाय। समय रहते ऐसी पहलों को नहीं शुरू किया गया तो, कपास उत्पादन के लिए जाना जाने वाला क्षेत्र वृहद किसान आत्महत्याओं के साथ, देह की मंडी के रूप में प्रसिद्ध होगा।
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Thursday, 17 February 2011

रमन सिंह की शांति-पहल के निहितार्थ


अनुज शुक्ला –
पिछले कई दिनों से छत्तीसगढ़ राज्य डा.विनायक सेन को लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बहसों के केंद्र में रहा है। राज्य की मौजूदा प्रवृत्तियों के आधार पर वहां लोकतंत्र को लेकर तमाम तरीके की आशंकाएँ व्यक्त की जा रही हैं। दस साल पहले कुछ बुनियादी जरूरतों में सुधार को लेकर राज्य गठन की प्रक्रिया को बल दिया गया था और यह माना गया था कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों की लगभग आधी आबादी वाले इस राज्य में नए राज्य बनने के बाद, वर्षों-पर्यंत चली आ रही समस्याओं का समाधान कर लिया जाएगा। समाधान तो संभव नहीं हुआ लेकिन वैश्वीकरण की प्रक्रिया में विकास के नाम पर एक राज्य के शैशवी सपनों और कौमार्य का गला घोट दिया गया। उनकी आँखों के सामने ही कार्पोरेटीय पिट्ठुओं के माध्यम से पूरी की पूरी सभ्यता को नष्ट करने का दुस्साहसी उपक्रम किया जाने लगा। यह निश्चित ही सत्य माना जाएगा कि पिछले कई दिनों से राज्य नक्सलवाद को लेकर समस्याग्रस्त रहा है। लेकिन क्या नक्सली हिंसा के इस सत्र में सारा दोषारोपण पक्ष विशेष पर किया जाना न्यायसंगत होगा, जबकि ऐसे कोई आधार नहीं मिलते कि राज्य के ऊपर लगे आरोपों को भी बेबुनियाद साबित किया जा सके? बहरहाल एक राज्य का यह अपना राजनीतिक मामला हो सकता है। लेकिन देश के अन्य हिस्सों की हजारो-हजार जनता यह अवश्य जानना चाहेगी कि वाकई वहां हो क्या रहा है? छत्तीसगढ़ की स्थिति और पुलिसिया आतंक का अंदाजा एक पत्रकार के इस बयान से लगाया जा सकता है कि ‘वहां जाकर सारी जिंदगी जेल में नहीं गुजारनी है’। अभी हाल के दिनों में राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने एक प्रेस कान्फ्रेंस और बीबीसी को दिए साक्षात्कार में यह बयान दिया कि ‘ मैं हर हाल में राज्य में शांति का पक्षधर हूँ’।
छत्तीसगढ़ एक विपन्न राज्य की भयावह कहानी है जहां आंकडों के गोलमाल के द्वारा देश-विदेश के दूसरे हिस्सों में भ्रामक सूचनाओं का सरकारी प्रसार किया जा रहा है। उदाहरण स्वरूप रमन सिंह का यह विज्ञापन देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपवाया गया कि ‘छत्तीसगढ़ में पाँच सालों में विकास दर 10.5 फीसदी दर्ज की गई जो मोदी के अतुल्य गुजरात से भी ज्यादा है’ और एक अनुमान में कहा गया है कि यह 2011 में 11.47 फीसदी तक पहुँच जाएगा। कृषि दर भी 2.3 के राष्ट्रीय दर की अपेक्षा 4.7 फीसदी है जो अगले साल छः फीसदी के जादुई आंकड़े को पार कर जायेगी। इन आंकडों पर दूसरी अन्य सरकारी और गैर सरकारी सांख्यिकीय संस्थाएं अट्ठहास कर रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड व्यूरों के अनुसार 2009 में छत्तीसगढ़ में 18011 पात्र किसान आत्महत्याएँ हुई हैं, जो विदर्भ के पात्र किसान आत्महत्याओं से भी ज्यादा हैं। इन आंकडों को लेकर राज्य सरकार और राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड व्यूरो के बीच मतभेद भी व्याप्त है। जहां विशेषज्ञों का यह मानना है कि राज्य में आत्महत्याओं को दर्ज करने की पुलिसिया तकनीकी के कारण ये काफी कम मात्रा में दर्ज की जा सकी हैं जबकि राज्य में इससे कहीं ज्यादा आत्महत्याओं से इंकार नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर छत्तीसगढ़ प्रशासन अपने बयानों के द्वारा यह आरोप चस्पा कर रहा है कि ये आंकड़े भी पूर्वाग्रही हैं। मानो बहस का यह मुद्दा नहीं है कि समस्या का समाधान कैसे किया जाय बल्कि यह साबित करने का प्रयास हो रहा है कि तुम्हारे यहां के मुक़ाबले हमारे यहां समस्या कम है। ठीक वैसे ही जैसे महिला उत्पीड़न के मामलों को लेकर दिल्ली और उत्तर प्रदेश परस्पर एक दूसरे को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं। चलिए एक क्षण के लिए यह मान लिया जाय कि ये आंकड़े विरोधाभास लिए हुए हैं लेकिन काबिलेगौर है कि जब राज्य में कृषि विकास की राष्ट्रीय दर 4.7 फीसदी है तो आखिर वे कौन से कारण हैं जिनसे 18011 किसान आत्महत्याएं हुई हैं? यह राज्य के कृषि विकास दर की बेबुनियाद बढ़त की पोल खोलता है। छत्तीस गढ़ का एक कटु सत्य है कि वहाँ के खेतिहर किसान आर्थिक विपन्नता के कारण देश के अन्य हिस्सों में मजदूरी के लिए पलायन कर रहे हैं। दूसरी ओर जिस 65 फीसदी बजट को राज्य स्वयं जुटाने की बात कर रहा है उसकी भी सच्चाई उजागर की जानी चाहिए। क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि इस 65 फीसदी हिस्सेदारी में एक बड़ा हिस्सा राज्य के निगमीकरण के कारण प्राप्त हो रहा है। राज्यों के खनिजों के दोहन के लिए निगमों द्वारा प्रदान किया जा रहा है। आखिर जब राज्य अपने बजट का 45 फीसदी हिस्सा आदिवासियों और अनुसूचित जन जातियों पर खर्च कर रहा है तो फिर क्यों आज बिहार और उत्तर प्रदेश की बजाय छत्तीसगढ़ की आबादी रोजगार के लिए पर-प्रान्तों की ओर पलायन कर रही है।
रमन सिंह का पूरा इशारा शांति और तथाकथित विकास के आलाप की ओर है। लेकिन शांति का आधार क्या? राज्य के आलोकतांत्रिक रवैये की तरफ ध्यान न दिया जाना या हर हाल में सिर्फ और सिर्फ चुप रहना। राज्य के नागरिकों में रमन सिंह सरकार को लेकर जैसा लोकतान्त्रिक भय बना हुआ है क्या वह किसी भी ढंग से जनतंत्र के लिए शुभ कदम माना जाएगा। क्योंकि असहमति को राज्य सीधे तौर पर देशद्रोह की कृत्यों के साथ जोड़ कर देख रही है। सरकार का नक्सलियों पर यह आरोप कि वह राज्य में आदिवासी बच्चों को 12 साल की उम्र में बंदूक पकड़ा देती है तो रमन सरकार भी इस आरोप से नहीं उबर सकती कि उसने सलवा जुड़ूम के नाम पर हजारों नाबालिक आदिवासियों को कलम और किताबें देने की बजाय बंदूके पकड़ाकर कभी न थमने वाले हिंसा के रसातल में धकेला है। पिछले सात सालों में गतिरोध को कम करने की बजाय दमनकारी और ध्वंसात्मक तरीके से इसे बढ़ाने का ही काम किया। दरअसल राज्य में जन विरोधी विचारधारा के प्रति संवेदना रखना, राज्य की असंवैधानिक कार्रवाइयों के खिलाफ असहमति व्यक्त करना छत्तीसगढ़ी होने का राजकीय अभिशाप है ।
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Tuesday, 15 February 2011

महिला आयोग की प्रासंगिकता और राजनीति

अनुज शुक्ला –
सरकारी आयोगों की कार्यप्रणालियां हमेशा शक के दायरे में रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर जितने भी आयोग गठित किए गए हैं, उनकी कार्य प्रविधि सत्ताधारी वर्ग के अनुकूल रही है। वह चाहे मानवाधिकार आयोग हो, एससी-एसटी आयोग या अल्पसंख्यक आयोग। राष्ट्रीय महिला आयोग भी इसका अपवाद नहीं। आधी आबादी के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया गया था। बीते वर्षों की काल अवधि गवाह है कि कैसे एक आयोग कस्बाई राजनीति के सर्कस का विदूसक बन चुका है।
आजादी के बाद से स्त्रीवादी कार्यकर्ता, महिलाओं के अधिकारों के सुरक्षा की व्यापक मांग करते आ रहे थे। 1990 के महिला सरंक्षण अधिनियम के तहत 1992 राष्ट्रीय में महिला आयोग की स्थापना की गई। महिला आयोग ने अपनी स्थापना के वक्त जारी घोषणा पत्र में स्त्री की स्वतंत्रता और सुरक्षा का जिक्र किया है। आयोग का मानना था कि अधिकांशतः स्त्री उत्पीड़न ऐसी जगहों पर फलीभूत होता है जहां स्त्रियॉं के सामाजिक - सांस्कृतिक अधिकारों की मनाही की जाती है। लोकतांत्रिक सिविल स्वतंत्रता कहती है कि स्त्री अधिकार मानव की अनिवार्य महत्ता को पहचान देते हैं। जाहिर है आयोग की भूमिका जवाबदेह और पारदर्शी होनी चाहिए। दुर्भाग्य से सिक्के का दूसरा पहलू भी है। पिछले वर्षों में ऐसा कई बार हुआ जब मामलों पर महिला आयोग की भूमिका को देखकर लगा कि अधिनियम में जो बातें कहीं गई हैं उसका अनुशरण खुद आयोग ही नहीं करता। उसकी रिपोर्टे सत्ता – सापेक्ष रही पाई गई।
बहरहाल महिला आयोग की प्रासंगिकता और राजनीति को समझने के लिए दिल्ली और उत्तर प्रदेश से बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। खासतौर से उत्तर प्रदेश में घटित महिला उत्पीड़न के मामले यहा की राजनीति के लिए सुरखाब के पर की तरह काम करते आए हैं । 2010 में दिल्ली महिला उत्पीड़न संबंधी 489 मामले दिल्ली पुलिस ने पंजीकृत किया। इसकी संख्या 2009 के 452 के मुक़ाबले ज्यादा थी। जबकि उत्तर प्रदेश में 2009 के साल 429 मामले, जो दिल्ली से कम थे संज्ञान में आए। दूसरी ओर बाल विबाह, भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ होने वाली उत्पीड़न की राज्यवार घटनाओं की राष्ट्रीय दर चौकाने वाली है। राष्ट्रीय अपराध व्यूरो के अनुसार यह उत्तर प्रदेश में 26.3 % है, जो कांग्रेस शासित आंध्र प्रदेश में 30.3% और संप्रग शासित तमिलनाडु में 33.6% से कम है। राजस्थान और हरियाणा की भी महिला उत्पीड़न की दर में बड़ी हिस्सेदारी है। सवाल उठता है कि महिला आयोग की कवायद इन राज्यों में क्यों शून्य है ? क्या सिर्फ इसलिए कि इन राज्यों में कांग्रेस की प्रत्यक्ष या परोक्ष सरकार है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि आयोग सरकारी नियंत्रण से मुक्त नहीं है। संप्रग शासित राज्यों में महिलाओं को लेकर किए जाने वाले उत्पीड़न की दर गैर कांग्रेसी राज्यों के मुक़ाबले कम नहीं रही है । अब जबकि बजट सत्र के कारण लखनऊ की राजनीति गर्म है, लगभग एक महीने बाद दिल्ली में गिरिजा व्यास और महिला आयोग को बांदा के शीलू की फिक्र होती है। क्या महिला आयोग की मौजूदा कवायद राजनीति से अभिप्रेरित नहीं ! सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर महिला आयोग की प्रासंगिकता क्या है?
यह देखने में आया है कि एक लंबे समय से, राष्ट्रीय महिला आयोग का राजनीतिक इस्तेमाल होता आया है। राजग के काल में गुजरात मामलों पर महिला आयोग की भूमिका संदिग्ध थी। महिला आयोग पहले यह मानने को तैयार ही नहीं थी की बलवाइयों ने बलात्कार की घटनाओं को अंजाम दिया है। सामाजिक संगठनों के दबाव से ही कुछेक मामले पंजीकृत हुए। गुजरात दंगे के दौरान महिलाओं से हुए बलात्कार पर स्वतंत्र जांच कमेटी का नेतृत्व करने वाले कमल मित्र चिनाय की रिपोर्ट और महिला आयोग की रिपोर्ट में जबरदस्त अंतर व्याप्त है। तीस्ता शीतलवाड़ या अन्य गैर सरकारी रिपोर्टे, सरकारी रिपोर्टों से भिन्न पाई गई। बलात्कार के दोषी बड़े कारकुनों को बचाने की आयोग ने भरसक कोशिश की थी। जाहिराशेख जैसे मामलों में आयोग की नौटंकिया अलग से शोध का विषय हैं। इशरतजहा के मामले पर महिला आयोग ने चुप्पी धारण कर ली। कश्मीर में आयोग की क्या भूमिका है यह शायद ही किसी को पता हो। आयोगों की कथा-महत्ता वाले ढेरो उदाहरण मिल जाएंगे। मतलब बिलकुल साफ है कि सत्ताधारी दल अपने फायदे की राजनीति के लिए आयोगों का बेजा इस्तेमाल करता है। शायद इसीलिए ही पार्टियां, आयोग के उच्च पदों पर अपने लोगों को बैठाती हैं।
अगर वाकई महिला आयोग स्त्रियॉं की सिविल अधिकारों को लेकर आग्रही है तो उसे शीलू जैसे मामलों पर राजनीति करने से बाज आना चाहिए। यह बिलकुल सही है कि उत्तर प्रदेश में महिला उत्पीड़न या अन्य आपराधिक मामलों में विधायकों और मंत्रियों के द्वारा या अपराध किया गया या अपराध को सरक्षण दिया गया। दरअसल यह तंत्र के विधिक दिवालिएपन का परिणाम है। न सिर्फ महिला आयोग बल्कि ढेर सारे सरकारी आयोगों को लोगो में ‘काहिरामय’ गुस्सा होने से पहले दोषियों को सजा देने एवं न्याय पर सबके अधिकार की व्यवस्था करनी चाहिए।
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Thursday, 10 February 2011

मूल निवास की राजनीति का दूसरा चेहरा

अनुज शुक्ला-
अमेरिका में पिछले हफ्ते इमिग्रेशन अधिकारियों ने वीज़ा क़ानून के उल्लंघन के आरोप में वैली विश्वविद्यालय के 18 भारतीय छात्रों के पैरों में इलेक्ट्रॉनिक टैग लगा दिए थे ताकि उनकी हरकत पर नज़र रखी जा सके। यह दुर्व्यहार संबंधी एक नया मामला है जो मध्य पूर्व एशिया में जारी गतिरोध के कारण मीडियाई बहसों में नहीं उभर पाया। बहरहाल इसे यूरोप में जारी अमानवीयता की श्रीखला की नई कड़ी के रूप में ही देखा जाना चाहिए । एशिया और अफ्रीका जैसे तीसरी दुनिया के नागरिकों के साथ यूरोपीय देशों में ऐसा व्यावहार होता आया है। अमेरिका वैश्वीकरण की प्रक्रिया को स्थापित करने वाला बड़ा संवाहक है जो विश्वग्राम की सोच को तो जरूर स्थापित कर रहा है, बावजूद इसके कि रेसलिज़्म सोच अभी तक परिवर्तित नहीं की जा सकी। दुनिया में किसी दूसरे देश के मुक़ाबिल फ्रांस को ज्यादा प्रगतिशील माना जाता है । फिर भी यह बार- बार देखने में आता है कि फ्रांस में गैर फ्रांसीसी धार्मिक और क्षेत्रीय प्रतीकों को लेकर हमेशा तनाव का माहौल बना रहता है। अमेरिका, कनाडा, इग्लैंड और आस्ट्रेलिया में दाढ़ी, पगड़ी, और बुर्का जैसे सांस्कृतिक, भौगोलिक और धार्मिक महत्त्व के प्रतीक हमेशा ही संदेहास्पद स्थिति में देखे जाते हैं। जबकि ‘लोकतान्त्रिक पूंजीवादी व्यवस्था में इंडीजेनस से अलगाव को लेकर ऐसे सांस्कृतिक प्रतीकों को मौजूद रखने की परंपरा का निर्वहन किया जाता है’। ऐसा नहीं है कि यह 26/11 के तथाकथित इस्लामिक आतंकी हमले के बाद होता आया है, बल्कि यूरोप में धार्मिक अस्मिता के करिश्माई प्रभाव को लेकर अतीत में कई प्रकार के संघर्ष होते रहे हैं। दूसरे विश्व युद्ध की विभीषिका के आधार में तो क्षेत्रीय, नस्लीय और धार्मिक प्रभुसत्ता एक बड़ा कारक साबित हो चुकी है। अब सवाल पैदा होता है कि क्या वाकई मौजूदा मामला भी इन्हीं कारकों के मूल से जुड़ा हुआ है या इसके तार कहीं और जाकर जुड़ते हैं? मौजूदा मामला अन्य दूसरे पक्षों की पड़ताल की अपेक्षा करता है।
दरअसल वैली विश्वविद्यालय जैसे प्रकरणों के मूल में पहली दुनिया और तीसरी दुनिया को परस्पर देखने, समझने के दृष्टिकोण की है। अपने खुद के हित के टकराव की भी। जाहिर है राजनीति के अलावे आर्थिक हित भी होंगे। उदारीकरण के बाद यूरोप में एशियाईयों के साथ होने वाले दुर्व्यहार को, डायस्पोरा में व्याप्त अंतरसंघर्ष से जोड़कर देखा जाता है। तर्क दिया जाता है कि यूरोप में शिक्षाटन के लिए कौन लोग जाते हैं? जाहिर सी बात है कि इसमें वे अधिकांश लोग महानगरों के उस समाज से होते हैं जो काले शीशे वाली गाड़ियों में महिलाओं के साथ बदसलूकी के लिए चिन्हित हैं। यानी वहाँ जाने वाले लोगों की अंतर्दृष्टि, भौगोलिक अंतर के बावजूद ठस कस्बाई ही रहती है। एक हद तक कुछ मामलों में इसे सही भी माना जा सकता है। लेकिन क्या इसे तार्किक कसौटी पर कसते हुए सही कहा जा सकता है? दुनिया की आर्थिक और सामाजिक रूपरेखा प्रस्तुत करने वाले कार्ल मार्क्स ने पूंजी और श्रम का विभाजन करते हुए ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ का नारा दिया। आज की पूंजी की राजनीति कहती है कि श्रमिक को हमेशा बाहरी होना चाहिए। यह इसलिए ताकि श्रमिकों का व्यवस्था पर राजनीतिक दबाव न पड़े। यानी ऐसी व्यवस्था हो जिसमें प्रवासी श्रमिक लोकल मिल मालिक और राज्य पर दबाव न बना पायें। पूंजी का चरित्र होता है समकेंद्रित करना। यानी लगातार यह कोशिश कि पूंजी परिधि के तरफ नहीं फैले। नेटिव इंडीजीनियस- जो यह नहीं समझते कि हम उनके खिलाफ क्यों हैं? अगर देखा जाये तो विकसित देशों का व्यापार, उत्पादन से लेकर विपणन तक तीसरी दुनिया के देशों पर आश्रित है। ठीक उसी तरह जैसे मुंबई, दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों का उत्पादन हिन्दी पट्टी के श्रमिकों पर आधारित है। और इन महानगरों में भी नेटिव इंडीजीनियस द्वारा वैसी ही घटनाएँ देखने को मिलती हैं जैसाकि यूरोपीय देशों में एशियाइयों के साथ होता आया है। विशेषज्ञों ने पूंजी के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण यह आशंका व्यक्त की थी की 2005 से 2020 के बीच में दुनिया के कई हिस्सों में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बदलाव होंगे। इसकी शुरूआत आस्ट्रेलिया की नस्ली वारदातों से मानी जा सकती है। मध्य पूर्व एशिया में मिश्र में राजनीतिक परिवर्तन के मौजूदा संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अरब वर्ल्ड में अवश्यंभावी राजनीतिक बदलाव होंगे। ट्यूनीशिया की आग बाहर तक फैल चुकी है। आर्थिक परिवर्तन में 2007 में शुरू हुई मंदी ने तीसरी दुनिया पर अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है। जबकि आर्थिक विशेषज्ञों का मत था कि भारत इसके प्रभाव से मुक्त रहेगा। भारत पर यह दूसरे तरीके से अपना प्रभाव डाल रहा है। पहले-पहल यूरोपीय राज्यों ने श्रम की आउटसोर्सिंग को बंद किया। और अब यूरोप में रह रहे भारतीयों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। मंदी के कारण बर्बाद हुए अय्याश यूरोपीय मध्य वर्गीय समाज ने अपनी चल-अचल संपत्ति को धड़ल्ले से बेचा। जाहिर सी बात है कि खरीददारों में बड़ी संख्या बचत करने वाले भारतीयों की रही। एशियश की उत्तरोतर प्रगति उस समाज की आँखों में चुभ गई। यह अकारण नहीं है बल्कि यूरोप में इमिग्रेशन टैग जैसे मामले मंदी के बाद ही बढ़े हैं। आने वाले समय में सिर्फ यूरोप में ही नहीं, लगभग दुनिया के हर हिस्से में, भारत में भी इस अव्यवस्थित पूंजीवादी व्यवस्था के कारण मूल निवासियों और प्रवासियों के बीच अंतरसंघर्ष और तेज होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।