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Thursday, 15 April 2010

आनंदवन का आनंद और व्रण

महाराष्ट्र की धरती पर अपने कर्मो से समाज को नयी दिशा और सोच देने वाले महापुरुषों की कमी नही है पर हमारी पढाई के तरीके हमें किताबी अनुभव से ज्यादा कुछ नही दे पाते। कारण चाहे जो भी पर ऐसा ही है। अपने किताबी अनुभव का वास्तविक अनुभव में बदलने की चाह में हम एक ऐसे व्यक्तित्व से जुडी जगह जाने का कार्यक्रम बनाया। इसके लिए चुना समाज से बाहर कर दिये गये कुष्ठ रोगियों के लिए अपना जीवन देने वाले बाबा आमटे के आश्रम 'आनंदवन' को। वहां जाने के लिए हम पॉच लोग सुबह की पैसेंजर से निकले। केवल दो घण्टे में हम वर्धा से वरोरा पहुॅच गये। वरोरा स्टेशन से आनंदवन तकरीबन 20 से 25 मिनट का पैदल रास्ता है। जैसे-जैसे हम आनंद वन की ओर जा रहे थे वैसे-वैसे स्कूल और कॉलेज में 'आनंदवन' के बारे में सुने गये ढेर सारे किस्से याद आ रहे थे। बाबा आमटे ने .......... को 6 कुष्ठ राेिगयों, एक अपाहिज गाय, पत्नी और अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ एक काली और पथरीली जमीन पर 'आनंदवन' बसाया था। ये आश्रम सच में आनंद का बगीचा है। अब तक सिर्फ सुना था कि आनंदवन में बाबा ने कुष्ठरोगियों की सेवा किस प्रकार कि और उन्हें किस प्रकार स्वावलंबन का पाठ पढाया। आनंदवन के बारे में और भी बहुत सुना पढ़ा था। वहॉ का ऑक्रेस्ट्रा 'स्वरावनंदनवन' की चर्चा तो पूरी दुनियॉ में है। उसे देखा/सुना भी है। तब से लेकर मन में एक चाहत थी कि आनंदवन देखूॅ और आनंदवन को करीब से महसूस करुॅ। लगभग 20 मिनट बाद हम आनंदवन में थे। हम मानों एक अलग दुनियॉ में आ गये थे। यहॉ कि स्वच्छता और हरियाली की नैसर्गिक सजावट देखकर हमें लग ही नही रहा था कि हम महाराष्ट्र के ही किसी हिस्से में हैं।
यहां हम सबसे पहले एक बडे से हाल में पहुॅचे जहॉ प्लास्टिक और रबर की बेकार चीजों से नई और आकर्षक वस्तुओं के निर्माण का कार्य चल रहा था। इसे देखकर बाज़ारी गिफ्ट का बेकार से लग रहे थे। दोनों हाथों से विकलांग एक लड़की अपने पैरों से ग्रिटिंग कार्ड बना रही थी। सारा काम अपने पैरों से ही करती ये लडकी आत्मनिर्भरता की जीती जागती मिसाल सी लगी। पैरों से छुट्टे गिनकर वापस करते हुए उसे देखकर प्रभावित हुए बगैर नही रहा जा सकता। हम आगे बिछौने और चद्दर बनाने वाले उन कुष्ठ रोगियों के पास पहुॅचे जहां पर कुष्ठ रोगी हाथकरघा से सुंदर सुंदर बिछौने और चद्दरें तैयार कर रहे थे। बाबा के पढ़ाये स्वावलंबन के पाठ ने कुष्ठ रोगियों को पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना दिया है। वहॉ से हम इस काली और पथरीली जमीन पर आनंद का वन बसाने वाले बाबा की समाधिस्थल पर आ गये।ं यहां कई महत्वपूर्ण उक्तियॉ और प्रेरक कविताएॅ पढ़ने को मिली। हम बाबा की समाधि के पास बैठे-बैठे बाबा को याद कर रहे थे। बाबा की स्मृति में डूबे हूए हम वहॉ से तालाब की ओर निकले जहॉ प्राणी संग्रहालय है। यहॉ कई तरह के जीवों का बसेरा है।
अब तक दोपहर हो चुकी थी और खाना खाने का साथियों का आग्रह भी जोर पकडने लगा था। दोपहर का खाना खाने के बाद हम प्रदर्शनी में गये। यहाँ कई किताबें हमें देखने को मिली जिसमें बाबा का जीवन वण्र् ान किया गया है। मराठी, हिंदी और अंग्रेजी के साहित्यकारों द्वारा बाबा के जीवन वर्णन की किताबें भी उपलब्ध है। आनंदवन की लकडियों से बनायी हुयी हस्तकला कृतियॉ भी वहॉ पर प्रर्दशित की गयी है। वहॉ पर कपडे झोले आदि वस्तुएॅ बिक्री के लिए रखी गयी थी। ये सब चीजें आश्रम में रहने वाले कुष्ठरोगियों ने ही बनायी हैं। प्रदर्शनी से बाहर निकलने के बाद हम बाबा की जीवन संगिनी 'साधना ताई' से मिलने पहुॅचे। उनसे मिलना हमारे जीवन का अद्भुत अनुभव था। साधना ताई के साथ हमें ऐसा लगा जैसे हम आश्रम के बरसों पुराने वासी हो। उनकी बोलने की शैली से हम प्रभावित हुए। हमारा प्रभावित होना सहज था क्योंकि हम ऐसी शख्ससियत से मिल रहे थे जिनसे जुडी प्रत्येक चीज समाजसेवा में लगी थी। उन्होने बाबा से जुडी कई घटनाएॅ हमें सुनायी। बात चीज में उन्होने बताया कि बाबा को झूठ बोलने वालों से शख्त नफरत थी और झूठों का साथ देने वालों से तो वो उनसे भी ज्यादा नफरत करते थे। बाबा अपने हाथों से कुष्ठरोगियों को नहलाते और उनके कपडे धोते थे। बेहद प्रेरणादायक बातचीत के बाद हम आश्रम में स्थित कुष्ठ रोगियों के अस्पताल पहुॅचे। वहॉ पर इलाज के लिए भर्ती एक 28 साल के एक तरुण रोगी ने बताया कि 'यहां पर हमें बहुत अच्छी तरह से संभाला जाता है। ये सब बाबा की कृपा है। बाबा ने वो कर दिखाया जो सरकार ने नही किया। आज हमें इतनी तकलीफ नही है क्योंकि अब समाज भी हमें अच्छी नज़र से देखने लगा है। यहां से इलाज कराने के बाद शादी करने का विचार है। आज तक बहुत से रिश्ते आये लेकिन किसी को धोखा देना अच्छी बात नही है। आनंदवन में रहकर बाबा के मूल्यों का पालन ही कर रहा हॅू।' बातचीत में बाबा के आदर्शों और मूल्यों की झलक मिल रही थी। 13 साल के संदीप ने अपना एक पैर कुष्ठ रोग के कारण दो माह पहले ही खो दिया था। चेहरे पर मासूमियत छलकती इस बच्चे के आत्मविश्वास भरी बातों ने हमें आश्चर्यचकित कर दिया। उसने कहा कि 'घर से आई बाबा और ताई मिलने आते हैं। मैं रोज डुप्लीकेट पैर लगाकर स्कूल जाता हॅॅू। वहां अपने दोस्तों के साथ खेलता भी हॅू।' संदीप को सचिन और शक्तिमान बहुत अच्छे लगते हैं। क्रिकेट खेलना बहुत पसंद है पर पैरों की वजह से खेलना भी बद हो गया है।
I sought my soul , my soul I could not see.
I sought my god , my god eluded me .
I sought my friend , I found all the three.
साधना ताई, वहां की धरती और आश्रम में रह रहे कुष्ठ रोगियों से मिलकर ऐसा लग रहा था कि समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए दृढ इच्छाशक्ति की भावना सबसे जरुरी होती है। आनंदवन से बाहर निकलते समय बाबा आमटे की भावना और उनके आश्रम की अमिट छाप मन पर पड चुकी थी।

16 April 2010, वर्धा/ निलेश बापूसाहेब झालटे

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