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Sunday, 18 April 2010

सवाल फ़िर उठे हैं

मैंने पिछ्ले पंद्रह दिनों में इसे छापने के लिए तीन समाचार पत्रों को भेजा. ये वे समाचार पत्र है जो जन सरोकारों की दुहाई देते फ़िरते है. यहा असहमति को कितना जगह दिया जाता है, मेरी समझ में आ गया.पहले विनायक सेन, सीमा आजाद और अब अरूंधति को लेकर सत्ता का नजरिया साफ़ दिखता है इस मुहिम को आगे बढाने का जिम्मा मीडिया ने अपने उपर ले लिया है. खैर यह सरकार असहमति के स्वर को सुनने की आदी नहीं रही है इसे तो सिर्फ़ और सिर्फ़ बारूद की आवाज सुनाई देती है........ मीडिया को भी .......
अनुज शुक्ला -
सवाल फ़िर उठे हैं, दंतेवाड़ा में नक्सल विद्रोहीयों ने बड़ी तादाद में अर्द्ध-सैनिक बल के जवानों की हत्या कर दी। हत्या से एक दिन पहले, गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने बयान दिया था कि ’नक्सली डरपोक हैं’। आपरेशन ग्रीन हंट के बाद लगातार राज-सत्ता, नक्सलियों को उकसाने का प्रयास कर रही है। यह सरकार की उस बड़ी मुहिम का हिस्सा है, जिसमें वह नक्सली समस्या के खिलाफ़, व्यापक जन-समर्थन का आधार तैयार कर रही है। जिसका उपयोग करके सत्ता के पहरेदारों की कारगुजारियों को जायज ठहराया जा सके और तमाम बड़े सवाल जो नक्सल समस्या की जड़ से निकल कर सामने आए हैं उन पर पर्दा डाला जा सके।
दरअसल हाल के कुछ महीनों में, हत्या-प्रतिहत्या का जो दौर सामने आ रहा है उसके कई निहितार्थ हैं। ’ग्रीन बेल्ट’ की अमूल्य खनिज संपदा का दोहन, इन घटनाओं की मूल जड़ है। पिछ्ले पांच वर्षों में भारत में अरबपतियों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अरबपतियों की संपत्ति का कुल हिस्सा देश की सकल घरेलु उत्पाद (25%) के बराबर है जो मात्र १०० उद्योगपतियों की घोषित संपत्ति है। अधिकांश उद्यमी वे लोग हैं जो किसी न किसी रूप से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में वन-संपदा के दोहन का व्यवसाय कर रहे हैं। २००८-२००९ के वित्त वर्ष में लगभग ९०% की वृद्धि दर से इनकी कमाई का इजाफ़ा दर्ज हुआ। इसमें सरकार की औद्योगिक नीति का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। वेदांता जैसी क्म्पनियों को सस्ते दरों पर खनिज क्षेत्र लीज पर दिया गया। इस संदर्भ पर मीडिया ने सरकार को सवालों के दायरे में खड़ा किया। चिदंबरम के वित्तमंत्री से गृहंमंत्री बनने तक के सफ़र पर भी सवालिया निशान लगे। एक तबके का मानना था कि यह सबकुछ कार्पोरेट घरानों के इशारे पर हुआ (इसका विस्तार से जिक्र अरूंधति राय ने अपने लेख ’धरती सुलग रही है’ में किया है।) सरकार जिस लाल गलियारे की बात करती आयी है उस क्षेत्र में औद्योगिक समूहों को आदिवासियों के जबरदस्त लोकतांत्रिक प्रतिरोध (नक्सल आंदोलन नहीं) का सामना करना पड़ा है। कई मर्तबा भ्रष्टाचार की बातें भी सामने आयीं, उद्योगपतियों के इसारे पर- पालिटिक्स, माफ़िया और पुलिस के गठजोड़ ने मिलकर इन इलाकों में आदिवासियों के खिलाफ़ जबरदस्ती की। वहा इतना सब कुछ होता रहा, इसकी सूचना कभी बाहर नहीं निकली। यह तभी संभव हुआ जब बड़ी वारदाते हुईं। मीडिया में आयी सूचनाएं भी एकपक्षीय दबाव से मुक्त नहीं मानी जा सकती।
खनिज दोहन की कमाई का एक बड़ा हिस्सा देशी और विदेशी कंपनियों के खाते में दर्ज होता है, सरकार को मामूली राजश्व की प्राप्ति होती है। अब सवाल उठता है कि औद्योगिक विकाश के नाम पर विस्थापन का दंश झेल रहे आदिवासियों के हिस्से क्या आया? गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, विस्थापन और उत्पीड़न का दर्द। यहीं से भावनात्मक अलगावाद की शुरूआत उन्हें प्रतिशोध के हद तक ले जाती है। ऐसी आशा क्यों की जाती है कि सिर्फ़ आदिवासी ही विकास के इस अमेरिकी माडल की कीमत चुकाएं? जंगलों में रह रहे आदिवासियों के परंपरागत व्यवसाय खत्म होते जा रहे हैं, वे इस विकाश के कारण तेजी से बेरोजगार हुए हैं। जो अजिविका का साधन हुआ करता था आज वह दूसरों के कब्जे में है। स्थिति को सुधारने के ठोस प्रयास नहीं हुए। वैकल्पिक रोजगार के साधन भी मुहैया नहीं करवाए गए और जिम्मेदार सरकार के मुखिया यह घोषणा करते रहे कि ’जो हमारे साथ नहीं वह नक्सलियों के साथ है’ से मनःस्थिति को समझा जा सकता है।
नक्सलियों का नरसंहार के लिए चिदंबरम जी के पास आपरेशन ग्रीन हंट का फ़ार्मूला तो है पर उनकी बदहाल स्थिति सुधारने का एजेण्डा नहीं। देश में न्याय पूर्ण व्यवस्था के निर्माण के लिए प्रासंगिक हो गया है कि लोग आगे आकर खनिज संपदा के लूट में शामिल छ्द्म नेताओं और कार्पोरेटीय गठजोड़ के षडयंत्र को उजागर करे।
Anuj4media@gmail.com

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