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Monday, 15 February 2010

प्रेम का विज्ञान


अमितेश्वर-
प्यार मानवीय शारीरिक संरचना की अंदरूनी कहानी है, निश्चित ही इसका संबंध दिल से नही है. प्रेम में डूबे लगभग सभी युवक-युवतियां यह कहते पाए जाते है कि वे एक दूसरे को दिल दे चुके हैं. प्यार की पूरी प्रक्रिया मे दिल का कोई लेना-देना नहीं है. दिल की वेदना या रोमांस कवियों की कल्पना का परिणाम है.
science के अनुसार दिल का काम शरीर की धमनियों में दौड़ते खून को शुद्ध करना है और इसका प्यार की भावना पर कोई नियंत्रण नही होता. प्रेम का scientific आधार है इसे साइकाँलजी आफ़ लव कह सकते है. मस्तिष्क में एक जगह का नाम है हाइपोथेलमस. इसमें दो न्यूरोट्रांसमीटर होते है, endomorphin और morphin. ये दोनो ट्रांसमीटर किसी भी विपरीत लिंग को देखते ही क्रियाशील हो जाते है. मनोविश्लेषकों का मानना है कि प्यार हो जाना इसी क्रियाशीलता का परिणाम होता है. ठीक इसीप्रकार एक और ट्रांसमीटर स्थाई प्रेम के लिए जिम्मेदार होता है जिसका नाम Cerotonin है. इसके द्वारा मनुष्य के मस्तिष्क में दूसरे के लिए स्थाई प्रेम के भाव जन्मने लगते है. मनुष्य के शरीर में एक रसायन पाया जाता है जिसे endorphin कहते है. यह सच्चे और समर्पित प्रेम का कारक होता है.
विश्लेषक प्यार को पांच रूपों में विभाजित करते हैं
रोस-यह शारीरिक भूख जैसी प्रेम की अवस्था है
ल्यूडस- इस अवस्था में दो प्रेमी एक-दूसरे से प्यार करने लगते है, लेकिन उनमे गंभीरता का अभाव रहता है. इसमे प्रेमी एक दूसरे को आकर्षित करने के लिए बनावती तौर-तरीके आजमाते है और स्वयं को स्मार्ट साबित करने की कोशिश करते है
उगापे - एक-दूसरे से जुदा न होने और एक-दूसरे के बिना मर जाने की कसम खाने लगते है
मेनीयक-यह वह अवस्था है जिसमें प्रेमियों को अगर जुदा कर दिया जाय तो वे आत्महत्या कर सकते हैं
प्रेग्मा-सही मायने में प्यार होने की अवस्था प्रेग्मा ही है. इसमें दोनों प्रेमी एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करते है. ये एक-दूसरे की भावनाओं को अच्छी तरह समझते है. प्रेग्मा में शर्म और उत्साह के लिए जगह नहीं होती.

1 comment:

  1. क्या बात है , बहुत खूब फरमाया आपने , अच्छा लगा प्यार के एहसास को शब्दो में पिरोना आपका ।

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