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Monday, 15 February 2010

मुंबई में मैच नहीं


अनुज शुक्ल
रोज नए-नए विवाद खड़ा करना ठाकरे परिवार की आदतों में शुमार हो चुकी है. राहुल गांधी और शाहरूख खान संबंधित मामले पर इन मराठी माणुसों की खिचाई पूरे देश में चर्चा का विषय है. विश्लेषकों ने तो यहां तक कह दिया कि ठाकरे परिवार का जलवा महाराष्ट्र में तेजी से घट रहा है, इसी खीझ बस आए दिन ठाकरे परिवार कुछ न कुछ नया करता रहता है. ताजा प्रकरण क्रिकेट को लेकर है. भारत में क्रिकेटीय राष्ट्रवाद के जरिए तमाम लोग अपनी राजनीतिक रोटियों को सेकना चाहते है. अर्शा पहले इसका इस्तेमाल शिवसेना कर चुकी है, जब उसने पाकिस्तान से मैच का विरोध करते हुए बेब्रोन की पिच को रातों-रात खोद दिया था. हाशिए पर जा रही पार्टी के लिए कोई मुद्दा बचा नही. राज ठाकरे ने मराठी-माणुस का मुद्दा पहले हथिया कर, हालिया विधान सभा चुनाव में शिव सेना को हार के गर्त में ढकेला. सबसे बड़ी बात जो उभर कर सामने आ रही है वह यह की ठाकरे परिवार के लिए मुख्य मुद्दा क्या है? लोग पशो-पेश में है कि कभी ये लोग मराठी मुद्दे को तूल देकर मरने मारने पर उतर आते है तो कभी इनके लिए हिंदुत्त्व मुद्दा बन जाता है. अबकी ठाकरे परिवार राष्ट्रवादी भावनाओं से ओत-प्रोत है.
आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम का भारत दौरा संभावित है. आस्ट्रेलिया में पिछ्ले दिनों भारतीयों पर लगातार हमले हुए. बाल ठाकरे का मानना है कि भारत को आस्ट्रेलिया के साथ क्रिकेट नहीं खेलना चाहिए. वे कम से कम मुंबई में मैच नहीं होने देने का संकल्प कर चुके हैं. इस आशय से संबंधित एक सी.डी. कैसेट बाल ठाकरे के हवाले से जारी किया गया. सबसे बड़ी बात तो यह है कि अभी तक जो ठाकरे परिवार और उनका संगठन उत्तर भारतीयों के साथ मुंबई में करता आया है वही आस्ट्रेलियाईयों ने भी वहा भारतीय छात्रों के साथ किया. इसमे तो उन्हे आस्ट्रेलियाइयों को शाबासी देनी चाहिए. वहां मार खाने वाले और मरने वाले दोनों भारतीय(अधिकांशतया महाराष्ट्र के बाहर के छात्र) ही थे. किस कसौटी पर मुंबई में किया गया कृत्य जायज है? जबकी मेलबाँर्न में किए गए उसी कृत्य को नाजायज ठहरा रहे हैं. दरअसल मुद्दों के अभाव में और जनाधार का तेजी से गिरना ठाकरे परिवार की चिंता का विषय है. हाल-फ़िलहाल उनके बड़बोले-पन ने उनकी काफ़ी हुज्ज्त करवाई है. उनकी राजनैतिक साख को बट्टा लगा है अबकी इसे क्रिकेटीय राष्ट्रवाद के जरिए सुधारने का प्रयत्न कर रहे है. ठाकरे जी अबकी कुछ मिलने वाला नही है, अभी समय है राजनीतिक जमीन बनाने का . पर यह उल-जुलूल की हरकतों से नहीं बल्कि ठोस सामाजिक मुद्दों से ही संभव है.

प्रेम का विज्ञान


अमितेश्वर-
प्यार मानवीय शारीरिक संरचना की अंदरूनी कहानी है, निश्चित ही इसका संबंध दिल से नही है. प्रेम में डूबे लगभग सभी युवक-युवतियां यह कहते पाए जाते है कि वे एक दूसरे को दिल दे चुके हैं. प्यार की पूरी प्रक्रिया मे दिल का कोई लेना-देना नहीं है. दिल की वेदना या रोमांस कवियों की कल्पना का परिणाम है.
science के अनुसार दिल का काम शरीर की धमनियों में दौड़ते खून को शुद्ध करना है और इसका प्यार की भावना पर कोई नियंत्रण नही होता. प्रेम का scientific आधार है इसे साइकाँलजी आफ़ लव कह सकते है. मस्तिष्क में एक जगह का नाम है हाइपोथेलमस. इसमें दो न्यूरोट्रांसमीटर होते है, endomorphin और morphin. ये दोनो ट्रांसमीटर किसी भी विपरीत लिंग को देखते ही क्रियाशील हो जाते है. मनोविश्लेषकों का मानना है कि प्यार हो जाना इसी क्रियाशीलता का परिणाम होता है. ठीक इसीप्रकार एक और ट्रांसमीटर स्थाई प्रेम के लिए जिम्मेदार होता है जिसका नाम Cerotonin है. इसके द्वारा मनुष्य के मस्तिष्क में दूसरे के लिए स्थाई प्रेम के भाव जन्मने लगते है. मनुष्य के शरीर में एक रसायन पाया जाता है जिसे endorphin कहते है. यह सच्चे और समर्पित प्रेम का कारक होता है.
विश्लेषक प्यार को पांच रूपों में विभाजित करते हैं
रोस-यह शारीरिक भूख जैसी प्रेम की अवस्था है
ल्यूडस- इस अवस्था में दो प्रेमी एक-दूसरे से प्यार करने लगते है, लेकिन उनमे गंभीरता का अभाव रहता है. इसमे प्रेमी एक दूसरे को आकर्षित करने के लिए बनावती तौर-तरीके आजमाते है और स्वयं को स्मार्ट साबित करने की कोशिश करते है
उगापे - एक-दूसरे से जुदा न होने और एक-दूसरे के बिना मर जाने की कसम खाने लगते है
मेनीयक-यह वह अवस्था है जिसमें प्रेमियों को अगर जुदा कर दिया जाय तो वे आत्महत्या कर सकते हैं
प्रेग्मा-सही मायने में प्यार होने की अवस्था प्रेग्मा ही है. इसमें दोनों प्रेमी एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करते है. ये एक-दूसरे की भावनाओं को अच्छी तरह समझते है. प्रेग्मा में शर्म और उत्साह के लिए जगह नहीं होती.