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Wednesday, 16 December 2009

ख्वाब

ख़वाब मरते नहीं
ख़्वाब दिल है न आंखें न सांसें कि जो
रेज़ा-रे़जा हुए तो बिखर जाएंगे
जिस्म की मौत से भी ये मर जाएंगे
ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब तो रोशनी है नवा है हवा है
जो काले पहाड़ों से रूकते नहीं
जुल्म के दोज़ख़ों से भी फ़ुकते नहीं
रोशनी और नवा और हवा के अलम
मक़तलों में पहुंचकर भी झुकते नहीं
ख़्वाब हो हर्फ़ है
ख़्वाब तो नूर है
ख़्वाब सुकरात है
ख़्वाब मंसूर है
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अहमद फराज , साभार इतिहास बोध से

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